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डिजिटल दुनिया


लब्ज़ महंगे हो गए है
मोबाईल सस्ते हो गए है,
उंगलियों से दरकते रिश्ते है
बधाई संदेश अब डिजिटली दिखते है।

मन लगता नहीं मेल मिलाप में
उलझ गए सब इस मायाजाल में,
बनावटी दुनिया में हम कहीं खो गए है
लब्ज़ महंगे हो गए
मोबाईल सस्ते हो गए है।

दादाजी के हाथ में भी
स्मार्टफोन है,
पता ही नहीं रिश्ते में
किसका कौन है।

कतार में भी सबकी गर्दन नीची है
मानो लगता है बीच में कहीं,
लक्ष्मण रेखा खींची है
सबके दिलों के अलग रस्ते हो गए है।

लब्ज़ महंगे हो गये 
मोबाईल सस्ते हो गए है।
वो अपनापन वो प्रेम कहां से लाये
गुलाब सी जिंदगी महकाए,
बच्चों का बचपन लौटाए
मन में प्रेम जगाए।

उन्हीं हसीन सपनों में
हम खो गए है,
लब्ज़ महंगे हो गए है
मोबाईल सस्ते हो गए है।

- विवेक असरानी
नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 4579589228573428919
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