शोर..
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मेरी ख़ामोशी में भी छुपा है अदब का शोर।
होंठ चुप हैं तो ये मतलब नहीं की झुक जाऊँ,
मेरे काम से ही दिखता है हुनर का शोर।
समझने वाले समझ लें मेरे जज्बातों को,
जरा सी हलचल से ही होता है मुखर का शोर।
तानाशाही के आगे झुकना मुझे आता ही नहीं,
बीना देखे ही सुनाता हूँ ज़माने का शोर।
जो मुझे बेबस समझते हैं,वो सन्नाटे में हैं
मेरे भन्नाटे से चलता है समर का शोर।
‘मिश्र’ की चुप्पी को साधारण न समझो यारों,
इससे ही गूँजता रहता है असर का शोर।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र
