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'तब पतझड़ में भी खिलेगा बसंत' पर परिचर्चा का आयोजन


नागपुर। प्रतिष्ठित संस्था हिन्दी महिला समिति जिसकी अध्यक्षा श्रीमती रति चौबे ने एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें एक अभूतपूर्व विषय 'तब पतझड़ में भी खिलेगा बसंत' पर सखियों ने अपने अलग-अलग अंदाज में विचार प्रस्तुत किया है जिसके कुछ अंश हैं..

- गार्गी जोशी के विचारों में टूटे पत्तों की सरसराहट में बीते दु:ख की आहट, नई आशा की धुन सी सुनाई देती है। 

- गीतू शर्मा कहती हैं कि मौसम में परिवर्तन होने पर जब बरसती बूंदें जब धरा का दामन चूमती हैं तब बसंत ऋतु झूम कर आ जाती है। 

- माधुरी यादव के अनुसार कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच रखें तब जीवन की कठिनाइयों रूपी पतझड़ में आशावादी बसंत का खिलना तय हो जाता है। 

- निशा चतुर्वेदी के अनुसार जीवन चक्र गतिमान होता है अर्थात् जीवन में सुख और दुख आंख मिचौली का खेल खेलते हैं ये जीवन के पूरक हैं। 

- रेखा तिवारी कहती हैं कि उन्हें बसंत बहुत पसंद है क्योंकि दुख रूपी पत्ते झड़ कर सुख और समृद्धि रूपी बसंत से जीवन में उमंग भर देता है।

- भगवती पंत के अनुसार जीवन में कितनी ही विपदा  आए, रास्ता न सूझे तब भी निराश न होकर श्रम बहाकर जीवन की अग्नि परीक्षा देकर सफ़लता हासिल करना ही पतझड़ में बसंत लाता है। 

- सुषमा अग्रवाल कहतीं हैं कि अविरल प्यार की गंगा बहाकर पतझड़ में बसंत ला सकते हैं। सामाजिक बुराइयों का अंत ही पतझड़ में बसंत है। रेखा पाण्डेय कहतीं हैं कि प्राकृतिक परिवर्तन है हमारा जीवन। जिस प्रकार पतझड़ में पत्ते झड़ जाते हैं और उनकी जगह नये पत्ते आ जाते हैं उसी प्रकार दुख भी स्थाई नहीं होता है वह भी जाता है और सुख और समृद्धि भी आती है।

- निवेदिता पाटनी के अनुसार पतझड़ की तरह ही होती है काली रात किन्तु भोर की लालिमा के आगे घुटने टेकने ही पड़ते हैं। जिस प्रकार धूप की तपिश सहकर भी पलाश की नई कोंपलें जन्म ले लेती हैं। उसी प्रकार आत्मविश्वास के चप्पू चलाकर साहिल तक पहुंच सकते हैं। 

- प्रीति खमेले के अनुसार उत्साह और संघर्ष करने का जज़्बा हो तो परिस्थिति कोई भी हो पतझड़ में बसंत ला ही लेंगे। 

- मंगला भुसारी के अनुसार पतझड़ नई राह पर चलना सिखाते हैं। सूखे पत्तों की चरमराहट में भी एक संगीत छुपा है जो, हर ग़म, हर तकलीफ़ को भूल जिंदगी में नई शुरुआत करना ही जीवन है, बताता है। 

- अध्यक्षा रति चौबे के अनुसार सामाजिक कुरीतियां और बुराइयां ही जीवन रूपी सदाबहार वन की पतझड़ हैं जिससे सम्पूर्ण मानव जीवन दुष्प्रभावित हो गया है। इन कुरीतियों को समाप्त कर दें तब बसंत आए झूम कर।
सचिव रश्मि मिश्रा कहतीं हैं हिम्मत को गले लगा कर कठिनाइयों को पैबंद कर, हौसला और मेहनत का हाथ थाम कर अड़चनों से जब लड़ेंगे तब पतझड़ में भी खिलेगा बसंत झूम कर। 

- ममता विश्वकर्मा के अनुसार पतझड़ आशा-निराशा के बीच हिचकोले खाता जीवन का वो क्षण है जिसमें एक छोटा सा प्रयास बसंत ला सकता है, जीवन में मंगल कर सकता है। 

- आभार सचिव रश्मि मिश्रा ने व्यक्त किया।
समाचार 4940573546500365881
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