'काग़ज़ पर ठहरा प्रेम' पुस्तक लोकार्पित
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नागपुर/भोपाल। आरिणी चैरिटेबल फाउंडेशन के तत्वाधान में दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय में प्रेमपत्रों एवं प्रेमगीतों से सजी पुस्तक, 'काग़ज़ पर ठहरा प्रेम', जिसका संपादन डॉ मीनू पांडेय नयन ने किया है एवं भव्या प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित है, का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ विकास दवे, निदेशक साहित्य अकादमी ने की। मुख्य अतिथि रहे राजेश भट, सूचना आयुक्त मध्यप्रदेश एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे जानेमाने ग़ज़लकार आलोक त्यागी एवं वरिष्ठ गीतकार ऋषि ऋंगारी।
कार्यक्रम का संचालन किया डॉ अनीता तिवारी ने। सरस्वती प्रस्तुत की प्रेक्षा सक्सेना ने। कृति की जिज्ञासा जागृत करने वाली चर्चा कुछ चुनिंदा प्रेमपत्रों को पढ़कर सुरुचिपूर्ण ढंग से धर्मेंद्र सिंह सोलंकी ने की और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया सभा में उपस्थित कोई भी श्रोता आनंद से अछूता न रह सका कुछ पत्रों की तो ऐसी बानगी प्रस्तुत की गई कि श्रोताओ की खिलखिलाहट से सदन समृद्ध हो गया।आभार प्रकट किया गया लीना बाजपेई द्वारा।
कार्यक्रम की विशेषता रही कि इसमें सभी अतिथियों को सपत्नीक आमंत्रित किया गया एवं उनसे उनके निजी जीवन के रोमांचक किस्सों को जानने के लिए संवाद कर्ता के रूप में उपस्थित रहे जानेमाने गीतकार दिनेश प्रभात। अध्यक्ष डॉ विकास दवे ने कहा- कोरे पत्र भी संदेश देने में सार्थक सिद्ध होते हैं। यह पुस्तक कागज पर ठहरा प्रेम नहीं बल्कि काग़ज़ पर बहता हुआ प्रेम है।
आंसुओं के भीगेपन से द्रवित करने वाले पत्र सच्चा प्रेम दर्शाते हैं। प्रेमपत्र इन्क्यूवेटर का कार्य करते हैं। जो रसायन स्पर्श के समय निकलता है, वही रसायन प्रेमपत्र पढ़ते समय निकलता है। प्रेम सफल तब होता है जब वह गृहस्थ जीवन में परिणित होता है - डॉ विकास दवे।
आजकल जब फिल्मों में से भी जब प्रेम खत्म हो गया है, तब इस तरह की कृति आना समय की आवश्यकता है - राजेश भट।
वैराग्य और मोक्ष प्राप्ति प्रेम से ही संभव है, जो इस पुस्तक में संकलित पत्रों में मिलता है - ऋषि शृंगारी।
श्रीमती सुनीता दवे, श्रीमती ममता त्यागी एवं श्रीमती सुलेखा भट ने भी अपने जीवन के रोचक प्रसंग सभी के सम्मुख प्रस्तुत किये।
प्रेमपत्रों एवं प्रेमगीतों से सजी पुस्तक काग़ज़ पर ठहरा प्रेम में सम्मिलित सभी 82 साहित्यकारों को कार्यक्रम में सपत्नीक सम्मानित किया गया। कुछ चुनिंदा प्रेमपत्रों को पढ़कर भी सुनाया गया।






