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समाज की एंट्रोपी


व्यक्ति का मन,
उसकी आदतें,
उसके औरों के साथ संबंध,
इन सबका विस्तार ही
समाज है।
इसलिए
जो भीतर होता है,
वही बाहर दिखाई देता है।
अगर मन बिखरा है,
तो संबंध बिखरेंगे।
और जब संबंध बिखरते हैं,
तो समाज भी
धीरे-धीरे
अव्यवस्थित होने लगता है।

समाज कोई अलग चीज़ नहीं है,
यह व्यक्तियों का
समूह मात्र है।
लेकिन यहाँ एक अंतर है,
व्यक्ति अपनी गलती
देख सकता है,
समाज में किसी एक की
गलती घुल जाती है।
भीड़ में जिम्मेदारी खो जाती है।
फिर हर कोई कहता है-
सिस्टम खराब है..
लेकिन
सिस्टम कौन है?
वही लोग
जो यह कह रहे हैं।
यहीं से
अव्यवस्था गहराती है।
नियम बनते हैं,
कानून बनते हैं,
लेकिन उनका पालन पहले
मन करता है, फिर शरीर।
और जब मन ही
बिखरा और जड़ हो,
तो व्यवस्था
कागज़ पर रह जाती है।

समाज की ‘एंट्रोपी’
अचानक नहीं बढ़ती,
वह धीरे-धीरे
लोगों की आदतों में,
उनकी चुप्पी में,
उनकी सुविधाओं में
जगह बनाती है।
फिर एक दिन
हम कहते हैं—
सब कुछ बिगड़ गया है..
असल में
कुछ भी अचानक नहीं बिगड़ा,
हमने उसे बिगड़ने दिया।

लेकिन
जैसे व्यक्ति खुद को संभाल सकता है,
वैसे ही समाज भी संभल सकता है।
शुरुआत कहाँ से होगी?
किसी बड़े परिवर्तन से नहीं,
किसी नीति से नहीं-
 शुरुवात होगी, एक व्यक्ति से।
जब कोई एक व्यक्ति
अपने मन को संभालता है,
अपने संबंधों को सुधारता है,
तो वह सिर्फ खुद को नहीं,
समाज के एक हिस्से को
व्यवस्थित करता है।
धीरे- धीरे
यही छोटे प्रयास
एक बड़ी व्यवस्था बनाते हैं।
क्योंकि
समाज का बिखराव
सामूहिक है,
लेकिन सुधार
हमेशा व्यक्तिगत होता है।
और अंत में- 
अव्यवस्था पर चर्चा करना आसान है,
व्यवस्था बनाना कठिन।
लेकिन वही कठिन काम
मानव को
मानव बनाता है।

मानव
परिवार, 
समाज, 
मोहल्ला
प्रदेश 
और फिर देश ये सब 
इसी सूत्र से बंधते है
जैसे अगर स्त्री लिखती पढ़ती है
तो पूरे देश को फरक पड़ता है
क्यों कि उस की विश्वासार्हता
सब से ज्यादा होती।

बस देश को 
सुधारने की जगह
अपना काम ठीक से करो 
तो 
सब सही होते रहेगा।

- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 705540976831731452
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