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अंधा भी..


अंधे को भी दिखता,
बहरे को सुनाई देता,
जब सत्य बहुत बड़ा हो,
तो वह इंद्रियों का 
मोहताज नहीं रहता।
कुछ चीजें
समझ के परे होती हैं,
और कुछ चीजें
हम समझना ही नहीं चाहते।
कभी बुद्धि छोटी पड़ जाती है,
कभी अहंकार बड़ा हो जाता है।

संपूर्ण अंधेरा
न शायद भ्रम है,
न संपूर्ण सत्य,
क्योंकि कहीं न कहीं
प्रकाश की संभावना
सदा छिपी रहती है।

डार्क होल
प्रकाश को निगल सकता है,
पर पहचान फिर भी
प्रकाश से ही बनती है।
एक शक्ति खींचती है,
दूसरी प्रकट करती है।

कितना जान चुका है मानव,
कितना अभी बाकी है,
यह भी तय नहीं हुआ,
और ज्ञानियों का मेला लगा है।

कोई मुट्ठी भर रेत लेकर
समुद्र का अर्थ समझा रहा है,
कोई एक दीपक लेकर
सूर्य पर भाषण दे रहा है।

जिस ब्रह्मांड का छोर
कल्पना तक नहीं छू पाई,
उस पर भी
अंतिम निष्कर्ष सुनाए जा रहे हैं।

बड़े- छोटे का
कोई अंतिम परिप्रेक्ष्य नहीं,
हर ऊँचाई के आगे
एक और आकाश खड़ा है।

पर शायद
हम सचमुच छोटे
ज्ञान के अभाव से नहीं रहे,
बल्कि उस क्षण छोटे हो गए
जब थोड़ा जानकर
पूर्ण ज्ञाता होने लगे।
ज्ञान बढ़ा,
साधन बढ़े,
रफ़्तार बढ़ी,
पर विनम्रता पीछे छूटती गई।

और शायद
सच्चा ज्ञानी वही है
जो हर नई खोज के बाद
थोड़ा और मौन,
थोड़ा और विनम्र
हो जाता है।

शायद इसी कारण
सुकरात ने कहा था,
मैं इतना जानता हूँ
कि मैं कुछ नहीं जानता।
यह अज्ञान की स्वीकृति नहीं थी,
बल्कि ज्ञान के 
अथाह समुद्र के सामने
उस महामानव की विनम्रता थी।

- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 7620731760725840162
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