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नौंजवानों! अब तो जागो करो पुरूषार्थ को साकार

                             

ऋषियों की संतानों जागो, समय की है यही पुकार, 
ज्ञान, तपस्या, स्वाभिमान से भर दो ये हुंकार । 
अपनी शक्ति को पहचानो  
और छोड़दो हर भ्रम का  व्यापार।।
नौंजवानों! अब तो जागो, करो पुरूषार्थ को साकार।।
           
हमेशी, नहीं रहता किसी का भी एकाधिकार, 
जो अपने सत्य पर चला और बढ़ा, बना वही रसूखदार।
स्वाध्याय की ज्योति जलाकर, दूर करो छाया अंधकार।।
नौंजवानों! अब तो जागो करो पुरुषार्थ को साकार।।
             
ज्ञान जहाँ सम्मानित होता, उदित होता वहीं संस्कार, 
शिक्षा,सेवा,सदाचार,का जहां रहता हो हथियार। 
तन में शक्ति, मन में दृढ़ता लेकर,
बढ़ो लक्ष्य की ओर अपार।।
 नौंजवानों !अब तो जागो करो पुरुषार्थ को साकार।।
         
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गूँजे फिर बौद्धिक उद्गार, 
भारत की संस्कृति का, यशगान होता रहे बार- बार।
वेदों की पावन वाणी से, 
जग में भर दो नव संचार।।
नौजवानों! अब तो जागो करो पुरुषार्थ को साकार।।
          
धन भी हो और ज्ञान भी हो,कर्मों से भी आये निखार, 
शक्ति और विनम्रता से,कर दो मानवता का उद्धार। 
ज्ञान, कर्म और ऐश्वर्य की, 
बहने दो अविरल धार।।
नौंजवानों! अब तो जागो, करो पुरुषार्थ को साकार।।
        
मत बैठो अब राम भरोसे, तजो अहं का संसार,
जो जूझ गया संघर्षों से, उसकी ही हुयी जय-जयकार। 
आत्मनिर्भरता और सुरक्षा,से दूर करो मन के विकार।।
 नौंजवानों! अब तो जागो करो पुरुषार्थ को साकार।।
             
'मिश्र' कलम की धार कहे, सुन लो युग की यह तकरार, 
ज्ञान- दीप यदि जल उठा,तो, छंट जाएगा सब अंधकार। 
अपने गौरव, अपने श्रम से,
दोहरा दो अपने इतिहास की  धार।।
नौंजवानों! अब तो जागो करो पुरुषार्थ को साकार।।
 
 - रामनारायण मिश्र
    नागपुर, महाराष्ट्र 
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