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मूल्य समृद्ध साहित्य लिखने का प्रयास करना चाहिए : प्रकाश एदलाबादकर


सुरपाखरू लेखक समुदाय’ द्वारा आयोजित ‘जो जे वांछील तो ते लिहो’ कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न

नागपुर। लेखक एक साधना है और उसके लिए पूर्व तैयारी आवश्यक होती है। लिखने के लिए पढ़ना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से पढ़ने की कला और आदत धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है, ऐसा वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश एदलाबादकर ने कहा। वे ‘सुरपाखरू लेखक समुदाय’ द्वारा लेखन में रुचि रखने वाले लोगों के लिए आयोजित संवादात्मक कार्यक्रम ‘जो जे वांछील तो ते लिहो’, अर्थात ‘जो जो चाहे, वह लिखे’, में अध्यक्षीय संबोधन दे रहे थे। 


यह कार्यक्रम रविवार, 14 जून को दोपहर 2 बजे नवदृष्टि सभागृह में संपन्न हुआ। 
उन्होंने अपने मार्गदर्शनपरक वक्तव्य में कहा- लिखने से पहले हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि हम क्यों लिख रहे हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे लेखन में दोहराव न आए। नियमित रूप से लिखना चाहिए, लेकिन केवल लगातार लिखते रहने के लिए नहीं लिखना चाहिए। लेखन में आत्मप्रशंसा नहीं होनी चाहिए। अनुभवों को अपने भीतर ठहरने और परिपक्व होने देना चाहिए। उन्हें तुरंत व्यक्त करने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। सतही और अपरिपक्व अनुभव आसानी से पहचाने जाते हैं। जिस विषय से लेखक एक आवश्यक भावनात्मक दूरी बनाए रख पाता है, उसी से श्रेष्ठ लेखन जन्म लेता है। हमें मूल्यसमृद्ध साहित्य लिखने का प्रयास करना चाहिए।


लेखन की विभिन्न प्रक्रियाओं पर चर्चा करते हुए वक्ता डॉ. शुभा साठे ने स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर और उनके भाइयों की पत्नियों द्वारा झेले गए जीवन-संघर्षों पर आधारित अपने उपन्यास ‘त्या तिघी’ की रचना-प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया। 
उन्होंने कहा- लेखन के लिए परकाया प्रवेश की क्षमता मनन और चिंतन के माध्यम से विकसित होती है। हम जो लिखते हैं, वह पाठक के हृदय तक पहुँचे, इसके लिए उसका उचित भावनात्मक और रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त होना आवश्यक है। आत्म-अभिव्यक्ति के लिए लिखना चाहिए।


सभागृह में उपस्थित उभरते और नवोदित लेखकों का मार्गदर्शन करते हुए दूसरे वक्ता प्रो. दीपक श्यामकांत कुलकर्णी ने स्वयं को अभिव्यक्त करने के विभिन्न माध्यमों की जानकारी दी। 
उन्होंने कहा- चाहे मौखिक अभिव्यक्ति हो या लिखित, शुरुआत में आने वाली कठिनाइयों पर विजय पाना आवश्यक है। लेखन की प्रक्रिया का आनंद लेते हुए अपनी क्षमता और शैली के अनुसार स्वयं को अभिव्यक्त करते रहना चाहिए।
कार्यक्रम के प्रारंभ में ‘सुरपाखरू लेखक समुदाय’ के अध्यक्ष और कवि तुषार जोशी ने प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए समूह का परिचय दिया तथा 30 दिनों में आयोजित किए जाने वाले 30 प्रकल्पों की जानकारी दी।
सुरपाखरू समूह के सदस्यों अपर्णा हरताळकर, मीना भालेराव, राम किन्हीकर और मनोज मोहिते ने अपने अनुभव साझा किए। सीमा जोशी ने आभार प्रदर्शन किया। शिवानी बलकुंदी द्वारा प्रस्तुत पसायदान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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