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परिश्रम और नैतिक मूल्यों का पालन ही सफलता का मूलमंत्र है : डाॅ. सुधीर भावे

                     

नागपुर। नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए अपने निर्धारित लक्ष्य  को प्राप्त करने के लिए लगातार परिश्रम करते रहना ही सफलता का मूल मंत्र है।- ये उद्गार थे सुपरिचित मनोचिकित्सक डॉ. सुधीर भावे  के जो उन्होंने विदर्भ हिंदी  साहित्य सम्मेलन के कार्यक्रम 'संवाद' में साहित्यकार डॉ. सागर खादीवाला से खुलकर बात करते हुए व्यक्त किये। एक गांव में जन्म लेने से लेकर मनोचिकित्सा जैसे गहन विषय में उच्चतम डिग्री और विशेषज्ञता हासिल करने की अपनी दिलचस्प जीवन- यात्रा के दौरान आए अनुभवों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने मानव- स्वभाव के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। 


डिप्रेशन, संशय, भय, संकोच, डिमेंशिया, आत्मविश्वास की कमी, उदासीनता, गुस्सा, हीन- भावना तथा याददाश्त संबंधी मिथकों व जनसामान्य में प्रचलित मान्यताओं की वास्तविकता से श्रोताओं को परिचित कराते हुए उन्होंने बताया कि कई  मामलों में केवल समुपदेशन (कंसल्टेशन) और सलाह से ही कई समस्याओं को दूर किया जा सकता है। यदि कहीं कोई गंभीर बात हो तो फिर औषधियों का सहारा लेना पड़ता है। मानसिक समस्या से ग्रस्त मरीज़ के लिए 'पागल' की बजाय मनोरूग्ण शब्द का इस्तेमाल करने पर उन्होंने बल दिया। युवाओं की समस्याओं के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज का समय कांपीटीशन का समय है ।हर क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा है। 

ऐसे में अपना लक्ष्य प्राप्त न होने पर युवाओं में अवसाद, निराशा और आक्रोश जैसी कई प्रकार की समस्याएं घर करती चली जा रही हैं। ऐसे में मानसिक  संतुलन न खोते हुए धैर्य  के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते रहना ही इस समस्या से निजात पाने का एकमात्र उपाय है । श्रोताओं द्वारा पूछे गए प्रश्नों और जिज्ञासाओं का उन्होंने बखूबी समाधान किया। डाॅ. भावे सुगम संगीत के जानकार व गायक भी हैं। श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने एक मधुर गीत  सुना कर सबका मन मोह लिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विभिन्न क्षेत्रों के श्रोतागण उपस्थित थे।
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