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एक पेड़ इस मां धरा के नाम : प्रकृति चहकेगी, हम महकेगे


नागपुर। हिन्दी महिला समिति का एक भावनात्मक कार्यक्रम पर्यावरण दिवस को समर्पित जो सभी के ह्दय को छू गया और तभी महान अलेक्जेंडर वांन हम्बोल्ट पर्यावरण के पिता और भारत में पर्यावरण  के जनक रामदेव जनक मिश्र के मुस्कराते चेहरे सबके सामने आ गये वातावरण सभी कवयित्रियों के मधुर स्वरों से गुंजायमान होने को मचल उठा। 

सर्वप्रथम संस्था अध्यक्ष रति चौबे नागपुर से बोल उठी- बन गया है काल मानव खुद ही प्रकृति पे, स्वार्थ में अंधा हो नाचे, श्रृंगारहीन करे धरा को- तभी भगवती पंत का गीत गूंजा- धरती माई सी सौम्या, सुखों का भंडार, गर्भ में छुपा है रत्नों का भंडार, गाकर कार्यक्रम आरम्भ  हुआ। गार्गी जोशी ने अपने ने विधाता प्रकृति व मानव पे विचार व्यक्त  कर विधाता के रोष को दर्शाया,तो सुषमा शर्मा ने पर्यावरण  को जीवन कर उसे मित्र बनाने को कहा, सुरेखा खरे अपने छंद गीत मांसाहारी कहा कि- ये फरियाद प्रकृति की है, दोस्तो यहां जज बना आदमी, तभी प्रसिद्ध नृत्यांगना छबि चक्रवर्ती के कदम भी थिरकने को व्याकुल हो उठे और प्रकृति गीत पे एक मनमोहक नृत्य कर वातावरण को रसमय बना दिया। 

तालियन से पटल गूंज उठा और आस्ट्रेलिया से आमंत्रित अतिथी रूप मे सुनीता शर्मा जो प्रसिद्ध लेखिका, कवियित्रि है देश विदेश मे सम्मानित ने अपने सुंदर विचार इस प्रकार व्यक्त किये कि- प्रकृति मुस्कराये, हरी भरी रहे, हमारी संवेदनाओं कर्म मे परवर्तित हो,और सामूहिक रूप सें हो तभी हमारा उत्तर दायित्व  पूर्ण  होगा,सभी ने विचारो को सराहा, डा. कविता परिहार  ने बहुत गंभीर, सी बात कही-आज नही तो कल होगा- विश्वास अगर हो तो मरुस्थल में भी जल होगा और निवेदीता पाटनी ने कहा-पर्वत सेहतमंद पिघली, चली बनके सरिता, यही तो जीवनदायिनी है, फिर से हुआ रस परिवर्तन और लक्ष्मी वर्मा ने पर्यावरण पर अत्यंत सुंदर नृत्य कर वातावरण मधुर कर दिया, तो रेखा तिवारी ने गीत गाया हे मानव तू प्रकृति से यूं खिलवाड कर क्या पोवेगा.. 

तभी आई मेलबोर्न से हमारी दूसरी अतिथी सुमन जैन कवियीत्रि लेखिका, संयोजका ने अपने विचार यूं बोले- पर्याय + वरण जो पर्याय है स्वम का हमने वरण किया है उसे खैरात की सौगात ना समझे. बहुत खूब, माधुरी यादव कहती है धरती का श्रृंगार पर्यावरण है तो अपराजिता कोस रही मानव को जो विकास के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड कर रहा है। गीता शर्मा ने प्रकृति बन परे कार्यक्रम को अति सुंदर किया। अनिता गायकवाड  व निधि अवस्थी का नृत्य- संगीत सुंदर रहा। पूनम मिश्रा ने भावनात्मक  कविता गाई, मंजूपंत ने उत्तराखंड  से ढोलक पे प्रकृति गीत गाया, ममता विश्वकर्मा, वर्षा, रूबी दास, अर्चना की प्रस्तुति अच्छी रही। 

अंत में कार्यक्रम की तीसरी अतिथी डा. अलका चौबे साईकोलाजिस्ट बम्बई ने कार्यक्रम की सराहना की और पर्यावरण को एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देख उसकी व्याख्या की। अंत मे आभार संस्था की उपाध्यक्ष  एवं होस्ट रेखा पांडेय ने माना और अध्यक्ष व कोषाध्यक्ष ममता विश्वकर्मा ने सभी बहनों के साथ एक संकल्प पर्यावरण को समर्पित किया यह गाते हुये.. आओ करे आज सभी एक संकल्प, अपनी सोच को बदले प्रवृति बदले, एक पेड इस धरा के नाम लगाकर, तभी तन महकेगा मन चहकेगा।

एक संवेदनशील, नवीनता लिये सार्थक, व्यवस्थित काव्यात्मक गीत संगीत प्रेरणादायक कार्यक्रम रहा। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण प्रकृति बनी गीता शर्मा रही सम्पूर्ण कार्यक्रम मे आच्छादित  रही.. अपने शब्द के साथ।

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