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चंदा चोरी पर भटकता विपक्ष!


अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दानराशि की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं का मामला इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस विषय पर स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। जांच एजेंसियाँ सक्रिय हैं, कई आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है, विशेष जांच दल (एसआईटी) पूरे मामले की पड़ताल कर रहा है तथा मंदिर ट्रस्ट ने भी प्रशासनिक स्तर पर बदलाव करते हुए दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। 

लोकतंत्र में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता पर प्रश्न उठाना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका कर्तव्य भी है। यदि श्रद्धालुओं के दान में किसी प्रकार की हेराफेरी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का मतभेद नहीं हो सकता।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रश्न यह है कि क्या विपक्ष अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा केवल इसी मुद्दे तक सीमित कर दे? क्या देश के सामने इससे भी बड़े और व्यापक मुद्दे नहीं हैं? क्या महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएँ, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ, उद्योग, निवेश, पर्यावरण, जल संकट, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के रोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषय विपक्ष की प्राथमिकता में पीछे चले गए हैं?

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों के प्रति समाज की संवेदनशीलता बढ़ी है। श्रीराम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में यदि मंदिर में किसी कर्मचारी या अधिकारी ने श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ छल किया है, तो इसका सबसे अधिक दुःख स्वयं हिंदू समाज को है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध भगवान श्रीराम के प्रति लोगों की श्रद्धा को कम नहीं कर सकता।

यही कारण है कि देश का एक बड़ा वर्ग इस मामले में राजनीति से अधिक न्याय चाहता है। वह चाहता है कि जांच पूरी पारदर्शिता से हो, दोषियों की पहचान हो और उन्हें सजा मिले। यदि ऐसा होता है तो श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा, क्योंकि इससे यह संदेश जाएगा कि कानून सबके लिए समान है।

वर्तमान में विपक्ष जिस प्रकार इस विषय को लेकर लगातार सरकार और वैचारिक संगठनों पर राजनीतिक हमले कर रहा है, उससे यह भी प्रश्न उठने लगा है कि कहीं वह जनता के वास्तविक सरोकारों से दूर तो नहीं होता जा रहा। भारतीय जनता पार्टी के पिछले एक दशक के राजनीतिक विस्तार का एक प्रमुख कारण यह भी माना जाता है कि उसने सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। ऐसे में यदि विपक्ष केवल धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों को राजनीतिक हथियार बनाता है, तो उसका लाभ उसे मिलेगा या सत्ता पक्ष को—यह विचार का विषय है।

इतिहास गवाह है कि मजबूत विपक्ष वही माना जाता है जो सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरता है। कभी संसद और सड़कों पर महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानों की समस्याओं, रोजगार और जनकल्याण के प्रश्नों पर बड़े आंदोलन हुआ करते थे। आज भी ये समस्याएँ समाप्त नहीं हुई हैं। युवा रोजगार चाहते हैं, किसान बेहतर आय चाहते हैं, मध्यमवर्ग महंगाई से राहत चाहता है और छोटे व्यापारी आर्थिक स्थिरता की अपेक्षा रखते हैं। यदि विपक्ष इन विषयों पर निरंतर जनआंदोलन खड़ा करे तो उसकी विश्वसनीयता निश्चित रूप से बढ़ सकती है।

आज का मतदाता पहले जैसा नहीं रहा। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ने उसे अधिक जागरूक बना दिया है। किसी भी समाचार का दूसरा पक्ष कुछ ही मिनटों में उसके सामने आ जाता है। अब केवल आरोप लगाने से जनमत तैयार नहीं होता। जनता तथ्यों, प्रमाणों और परिणामों को भी देखती है। यही कारण है कि केवल राजनीतिक नारों के आधार पर चुनाव जीतना पहले की अपेक्षा अधिक कठिन हो गया है।

विपक्ष को यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र केवल विरोध का नाम नहीं है। जहां सरकार जनहित में कार्य करे, वहाँ उसकी प्रशंसा करना भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है और जहाँ कमियाँ हों, वहाँ तथ्यों के साथ सशक्त विरोध होना चाहिए। लगातार हर विषय पर नकारात्मक राजनीति करना जनता के बीच विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।

दूसरी ओर सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि किसी धार्मिक संस्था, सरकारी विभाग या सार्वजनिक ट्रस्ट में भ्रष्टाचार होता है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों को दंडित करना सरकार का नैतिक दायित्व है। हाल की घटनाओं में भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई, गिरफ्तारियाँ और ट्रस्ट द्वारा प्रशासनिक बदलाव इसी दिशा में उठाए गए कदम माने जा रहे हैं। अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता और विपक्ष दोनों की जवाबदेही में निहित है। यदि विपक्ष केवल प्रतीकात्मक मुद्दों में उलझा रहेगा और सरकार केवल राजनीतिक जवाब देने तक सीमित रहेगी, तो नुकसान अंततः देश की जनता का होगा।

आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। ऐसे समय में रोजगार सृजन, कौशल विकास, शिक्षा की गुणवत्ता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, कृषि सुधार और सामाजिक समरसता जैसे विषय राष्ट्रीय बहस के केंद्र में होने चाहिए। संसद और राजनीति का उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि जनता केचंदा चोरी पर भटकता विपक्ष! 

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दानराशि की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं का मामला इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस विषय पर स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। जांच एजेंसियाँ सक्रिय हैं, कई आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है, विशेष जांच दल (एसआईटी) पूरे मामले की पड़ताल कर रहा है तथा मंदिर ट्रस्ट ने भी प्रशासनिक स्तर पर बदलाव करते हुए दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। 

लोकतंत्र में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता पर प्रश्न उठाना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका कर्तव्य भी है। यदि श्रद्धालुओं के दान में किसी प्रकार की हेराफेरी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का मतभेद नहीं हो सकता।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रश्न यह है कि क्या विपक्ष अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा केवल इसी मुद्दे तक सीमित कर दे? क्या देश के सामने इससे भी बड़े और व्यापक मुद्दे नहीं हैं? क्या महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएँ, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ, उद्योग, निवेश, पर्यावरण, जल संकट, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के रोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषय विपक्ष की प्राथमिकता में पीछे चले गए हैं?

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों के प्रति समाज की संवेदनशीलता बढ़ी है। श्रीराम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में यदि मंदिर में किसी कर्मचारी या अधिकारी ने श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ छल किया है, तो इसका सबसे अधिक दुःख स्वयं हिंदू समाज को है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि किसी व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध भगवान श्रीराम के प्रति लोगों की श्रद्धा को कम नहीं कर सकता।

यही कारण है कि देश का एक बड़ा वर्ग इस मामले में राजनीति से अधिक न्याय चाहता है। वह चाहता है कि जांच पूरी पारदर्शिता से हो, दोषियों की पहचान हो और उन्हें सजा मिले। यदि ऐसा होता है तो श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा, क्योंकि इससे यह संदेश जाएगा कि कानून सबके लिए समान है।

वर्तमान में विपक्ष जिस प्रकार इस विषय को लेकर लगातार सरकार और वैचारिक संगठनों पर राजनीतिक हमले कर रहा है, उससे यह भी प्रश्न उठने लगा है कि कहीं वह जनता के वास्तविक सरोकारों से दूर तो नहीं होता जा रहा। भारतीय जनता पार्टी के पिछले एक दशक के राजनीतिक विस्तार का एक प्रमुख कारण यह भी माना जाता है कि उसने सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। ऐसे में यदि विपक्ष केवल धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों को राजनीतिक हथियार बनाता है, तो उसका लाभ उसे मिलेगा या सत्ता पक्ष को—यह विचार का विषय है।

इतिहास गवाह है कि मजबूत विपक्ष वही माना जाता है जो सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरता है। कभी संसद और सड़कों पर महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानों की समस्याओं, रोजगार और जनकल्याण के प्रश्नों पर बड़े आंदोलन हुआ करते थे। आज भी ये समस्याएँ समाप्त नहीं हुई हैं। युवा रोजगार चाहते हैं, किसान बेहतर आय चाहते हैं, मध्यमवर्ग महंगाई से राहत चाहता है और छोटे व्यापारी आर्थिक स्थिरता की अपेक्षा रखते हैं। यदि विपक्ष इन विषयों पर निरंतर जनआंदोलन खड़ा करे तो उसकी विश्वसनीयता निश्चित रूप से बढ़ सकती है।

आज का मतदाता पहले जैसा नहीं रहा। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ने उसे अधिक जागरूक बना दिया है। किसी भी समाचार का दूसरा पक्ष कुछ ही मिनटों में उसके सामने आ जाता है। अब केवल आरोप लगाने से जनमत तैयार नहीं होता। जनता तथ्यों, प्रमाणों और परिणामों को भी देखती है। यही कारण है कि केवल राजनीतिक नारों के आधार पर चुनाव जीतना पहले की अपेक्षा अधिक कठिन हो गया है।

विपक्ष को यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र केवल विरोध का नाम नहीं है। जहां सरकार जनहित में कार्य करे, वहाँ उसकी प्रशंसा करना भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है और जहाँ कमियाँ हों, वहाँ तथ्यों के साथ सशक्त विरोध होना चाहिए। लगातार हर विषय पर नकारात्मक राजनीति करना जनता के बीच विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।

दूसरी ओर सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि किसी धार्मिक संस्था, सरकारी विभाग या सार्वजनिक ट्रस्ट में भ्रष्टाचार होता है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों को दंडित करना सरकार का नैतिक दायित्व है। हाल की घटनाओं में भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई, गिरफ्तारियाँ और ट्रस्ट द्वारा प्रशासनिक बदलाव इसी दिशा में उठाए गए कदम माने जा रहे हैं। अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता और विपक्ष दोनों की जवाबदेही में निहित है। यदि विपक्ष केवल प्रतीकात्मक मुद्दों में उलझा रहेगा और सरकार केवल राजनीतिक जवाब देने तक सीमित रहेगी, तो नुकसान अंततः देश की जनता का होगा।

आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। ऐसे समय में रोजगार सृजन, कौशल विकास, शिक्षा की गुणवत्ता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, कृषि सुधार और सामाजिक समरसता जैसे विषय राष्ट्रीय बहस के केंद्र में होने चाहिए। संसद और राजनीति का उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि जनता के जीवन को प्रभावित करने वाले विषयों पर सार्थक विमर्श हो।

अंततः, अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दानराशि की कथित चोरी की निष्पक्ष जांच और दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन इसके साथ-साथ विपक्ष को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह अपनी राजनीतिक भूमिका का विस्तार जनता के वास्तविक मुद्दों तक करेगा या केवल तात्कालिक राजनीतिक विवादों तक सीमित रहेगा। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता जवाबदेह हो और विपक्ष जनहित के व्यापक प्रश्नों को पूरी गंभीरता से उठाए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का मूल आधार है।

- डॉ. प्रवीण डबली
स्वतंत्र वरिष्ठ पत्रकार | जल कार्यकर्ता | जल योद्धा पुरस्कार प्राप्त । पोस्चर करेक्शन प्रशिक्षक | योग थेरेपिस्ट | हेल्थ मोटिवेशनल स्पीकर | नर्व स्टीमूलेशन थेरेपिस्ट
ईमेल: pravindabli@gmail.com
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