लोकतंत्र आज शर्मिंदा है पर विश्वास का आधार साथ है
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नागपुर। नागपुर वैचारिक मंच द्वारा विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के साकेत भवन में आयोजित कार्यक्रम लोकतंत्र पर संकट विषय पर अपनी प्रस्तुति रखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार इंदिरा किसलय का मत था कि भारत लोकतंत्र की जननी है। आज व्यवस्था ने अपने मतदाता तैयार किए हैं, जो माध्यमों के साथ बिकाऊ हो चुका है। मशहूर मंच संचालक डॉ. सागर खादीवाला का मत था आज लोकतंत्र की कल्पना जिसने की होगी उसकी आत्मा दुखी होगी। प्रजातंत्र आज धूमिल हो गया है, न्यायपालिका, लोक प्रतिनिधि, मीडिया सभी व्यवस्था दल बदल कानून के अंतर्गत बदल रही हैं। दलबदलू का पहले इस्तीफा होना चाहिए, तब लोकतंत्र बचेगा।
पावर ऑफ वन के संपादक नीरज श्रीवास्तव ने लोकतंत्र के चारों हिस्से की बात करते हुए कहा कि लोकतंत्र को समझने का नजरिया का फर्क है। आज भी अभिव्यक्ति की आजादी है। मीडिया को नाहक कोशा जा रहा है। संविधान में कई बदलाव हो चुके हैं। सरकार वैचारिक आधार पर चुनी जा रही है और अपने अनुसार लोगों को नियुक्त करते हैं, यही व्यवस्था होती है। कार्यक्रम संयोजक डॉ. राजेंद्र पटोरिया ने आज की व्यवस्था को अघोषित इमरजेंसी से तुलना की। आज व्यवस्था लोगों को जाति, धर्म के आधार पर बांट रही है। मंदिर के नाम से वोट ले रहे हैं, यह कैसा लोकतंत्र है। आज स्वतंत्र अभिव्यक्त करते हुए डर लगता है। बुद्धिजीवी से ही आज ज्यादा खतरा है, जनता को आगे आना होगा।
हेमलता मिश्र मानवी का मत था कि आज लोकतंत्र की बातें हवा हो गई हैं। आज नेता के लिए, नेताओं के द्वारा, नेताओं ने अपनी व्यवस्थाएं बना रहे हैं। नीलिमा शुक्ला, माधुरी राउलकर, सुकेशनि सरगम ने भी अपनी बात को कविता के माध्यम से रखा ।पत्रकार, संपादक कृष्ण नागपाल का मत था जिसे हम मत दान कर रहे हैं, वह भी अपना पक्ष बदल रहा है। योजना को भ्रष्ट लोग अपने फायदे के लिए बना रहे हैं और लोकतंत्र शब्द को नाहक बदनाम कर रहे हैं। डॉ. भालचंद्र जैन का मत था के लोकतंत्र में जब सही नीतियां कार्य करेंगी तो आज लोकतंत्र फिर खड़ा हो रहा है। सारा राष्ट्र धर्म के नाम पर ज्यादती कर रहा है।
वहीं अधिवक्ता ओ. डी. जैन का मत था अंग्रेजों के समय राज घरानों में भी लोकतंत्र व्यवस्था नहीं थी। हमारा लोकतंत्र जन आंदोलन की तपस्या, त्याग और बलिदान से आया है। जनता को सरकार पर लगाम लगा रक्षक बनकर खड़े होना होगा। संपादक पत्रकार और प्रकाशक दुर्गा प्रसाद अग्रवाल का मत था कि आज लोकतंत्र काफी चुनौतियों से गुजर रहा है। विपक्ष को हमेशा लोकतंत्र पर खतरा मंडराता हुआ नजर आता है। आज पासपोर्ट का मसला उठा है वह भी आपकी नागरिकता का प्रमाण नहीं है। तो व्यवस्था पर गहन चिंतन जरूरी है।
उपप्रबंधक पारसनाथ शर्मा का लोकतंत्र में अभी भी विश्वास था उनका मत था कि जांच एजेंसियां, चुनाव आयोग को निष्पक्ष होना चाहिए। धृति बेड़ेकर ने विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र की स्थिति के परिदृश्य को प्रस्तुत कर स्वीडन की एक संस्था का सर्वे प्रस्तुत किया, जिसमें बदल रही वैश्विक मानसिकता है। एक सार्थक और गहन चर्चा के उपरांत अगला विषय वर्तमान में शिक्षा व्यवस्था पर 12/7/26 इतवार को शाम 3 से 5 तक साकेत भवन में आयोजित किया जाएगा।
