बकायोक्ति
"उभा राहे एके चरणीं धरूनि धरनीयां
तपश्चर्या वाटे करीत जणू डोळे मिटुनियां,
बका ऐसा धोर्ता तव अमित मांसचि टपती,
परी ज्ञाते तुझे कपट लवलाही उमजती."
कृष्णशास्त्री चिपळूणकर की यह कविता
जिसे बकायोक्ति कहा जाता है,
आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ी फिट बैठती।
भले ही शास्त्री जी ने
इसे लगभग १८६५ के
आसपास लिखी हो,
"मानो उन्होंने भविष्य की
राजनीति का पूर्वाभास कर लिया हो।"
जैसे उन्होंने देख लिया था
कि स्वतंत्रता के बाद ऐसे
सफेद कपड़े वालों की झुंड
देश में रहेगी
जो सेवा के नाम से
अपनी चांदी काटेंगी।
अगर इस हिंदी में देखे तो:
"एक पैर पर खड़ा हुआ,
मानो धरती को थामे हुए।
आंखें मूंदे ऐसा लगे,
जैसे कठोर तपस्या में लीन हो।
परंतु वह बगुला बड़ा धूर्त है,
उसकी सारी दृष्टि तो
मछलियों के मांस पर ही
टिकी रहती है।
उसका यह छल और कपट
लोग देर-सवेर पहचान ही लेते हैं।"
शास्त्री जी दृष्टा तो थे
लेकिन बड़े भोले रहे होंगे
कभी तो कहा कि इनके ढोंग को
जनता पहचान लेंगी।
ऐसा होते हुए तो
सैकड़ों सालों से नहीं दिख रहा।
आज भी ये बगुले भगत उतने ही
निर्ममता से देश को लुट रहे।
आज भी मंचों से सेवा की कसमें खाते है
आज भी अपने लड़कों को,
भाई भतीजों को,
जमाई को,
अपने पदों से मिलने वाले
फायदे खुले दिल से बांटते है।
आजादी के पहले कुछ गिने चुने ही थे
बाद में तो इतने भी नहीं रहे।
आज लोगों को इतना तो समझ गया कि
सफेद खादी एक बड़ा फ्रॉड है।
लेकिन कोई विकल्प नहीं दिखता।
"फिर नए चेहरे भी आए,
परिवर्तन के वादे भी आए,
पर जनता की निराशा
पूरी तरह दूर न हो सकी।"
जनता परेशान है
हतप्रभ है,
थक चुकी है,
और अपने जान मुट्ठी में
लेकर खड़ी है।
शास्त्री जी की "बकायोक्ति"
आज भी जीवित है।
बस बगुले बदल गए हैं,
तालाब वही है।
कृष्णशास्त्री चिपळूणकर ने
बगुले को देखा था,
हमने तो
पूरी बगुला- व्यवस्था देख ली।।
- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
नागपुर, महाराष्ट्र