पाश्चात्य साहित्य चिंतन को समझने की जरूरत : प्रो. उपाध्याय
नागपुर। आधुनिक समय को जानने के लिए पाश्चात्य साहित्य चिंतन को समझना बहुत जरूरी है। पाश्चात्य विचारकों ने साहित्य के आधारभूत पक्षों पर गहराई से विचार किया है। उन्होंने साहित्य की प्रकृति, संरचना और सामाजिक संबद्धता पर व्यवस्थित रूप से विचार किया है।
यह बात मुंबई विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रख्यात समालोचक प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने पाश्चात्य विचारकों और काव्यान्दोलनों पर विचार व्यक्त करते हुए कही। वे हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी विचारकों ने साहित्य और जीवन की बुनियादी समस्याओं पर विचार किया है। प्लेटो से लेकर इलियट तक की काव्य चिंता को रेखांकित करते हुए प्रो. उपाध्याय ने बताया कि इन विचारकों ने साहित्यिक कसौटियों को उनकी सामाजिक संबद्धता के आलोक में व्याख्यायित किया। साहित्य की सामाजिक उपादेयता और उसके सरोकारों को पश्चिम में सबसे पहले प्लेटो ने उद्घाटित किया। उसके विचारों में साहित्य की सामाजिक भूमिका रेखांकित होती है।
इलियट, जिसे पश्चिमी साहित्य में आधुनिक मूल्य-मीमांसा का जनक माना जाता है, उसने परम्परा की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत की। प्रो. उपाध्याय ने पाश्चात्य साहित्य आंदोलनों की प्रवृत्तिगत विशेषताओं का उल्लेख करते हुए स्वच्छंदतावाद, अभिजात्यवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि पश्चिमी साहित्य आंदोलनों ने सिर्फ यूरोप ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के साहित्य और समाज को प्रभावित किया।
इन आंदोलनों में साहित्य की सामाजिक चिंता झलकती है। पश्चिमी साहित्यांदोलनों को क्रमवार समझने की जरूरत है, क्योंकि सभी के विकासक्रम में एक अंतः सूत्रता है । वर्तमान दौर में उत्तर आधुनिकतावाद की विशेष चर्चा है । इसकी प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि आज की जितनी भी नई चिंतन सरणियाँ है सबका संबंध इससे है । इसने पर्यावरण, रंगभेद-नस्लभेद, स्त्री और हाशिये के समाज की चिंताओं को पुरजोर तरीके से उठाया है।
इसे विसंरचनावाद, विखंडनवाद आदि नाम भी दिये गए हैं, किन्तु उत्तर आधुनिक विमर्शों की परिधि में ही इसे देखा जाना उचित होगा। प्रास्ताविक उद्बोधन देते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि पाश्चात्य साहित्य चिंतन धीरे-धीरे एक दुरूह विषय होता जा रहा है। साहित्य को समझने के लिए, साहित्य-विवेक विकसित करने के लिए शास्त्रीय आधारों से परिचित होना अत्यावश्यक है।
आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की बहुत सी जानकारी पश्चिमी पटल से आती है, साहित्य उससे अछूता नहीं है, इसलिए यह जरूरी है कि पश्चिमी साहित्यिक विचारकों, मान-मूल्यों और कसौटियों पर विचार की प्रक्रिया सतत जारी रहे। अतिथि परिचय डॉ. निखिलेश यादव ने दिया और धन्यवाद ज्ञापन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. संतोष गिरहे ने किया।
