जैन साहित्य के अनुसार श्रीराम जी ने कभी हथियार नहीं उठाए : डॉ. शेख
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नागपुर/पुणे। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज के तत्वावधान में आयोजित आभासीय संगोष्ठी जिसका विषय - 'जैन साहित्य में रामकथा के कवि' इस कार्यक्रम के अध्यक्षीय भाषण में डॉ.शहावुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख , पुणे महाराष्ट्र अपना मंतव्य दे रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि,- जैन साहित्य के अध्ययन से हम पाते हैं कि, जैन साहित्य का उतना ही महत्व है, जितना बौद्ध साहित्य का , बाल्मीकि रामायण आदि का, तुलसीदास की रामचरितमानस पर जैन साहित्य का प्रभाव दिखाई देता है। आज हमें नई धारा से जुड़ने का मौका मिला है।
विशिष्ट अतिथि - डॉ.ओम प्रकाश त्रिपाठी, संस्था उपाध्यक्ष, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश ने कहा कि - धर्म वही है जो, धारण किया जाए। सभी धर्मों का लक्ष्य मानवता की रक्षा और समाज और देश में सार्वभौमिकता स्थापित करना होता है। जिस तरह नदियां समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह सभी धर्म विकासशीलता की स्थापना करते हैं। जैन धर्म में मानव मूल्यों की स्थापना और जीव से जीव का संबंध बताया है। आत्मा ही दर्शन एवं साक्षात्कार का रूप है, परम सत्य का प्रकाश है। इस धर्म में दर्शन की व्याख्या विभिन्न रूपों में की गई है।
डॉ. दीपिका सितोदिया, गोवाहाटी , असम ने कहा- जैन साहित्य के अंतर्गत दशरथ की चार रानियां थीं- अपराजिता, सुमित्रा, सुप्रभा, कैकई। उनसे 4 पुत्र थे । रावण को राम ने नहीं मारा लक्ष्मण जी ने मारा । जैन धर्म में लंकापति रावण को अच्छा दर्शाया है । जैन धर्म में राम जी को पद्मा के नाम से जाना जाता है। जैन साहित्य में अहिंसा है।
मुख्य अतिथि - डॉ. अरुणा शुक्ला, नांदेड़, महाराष्ट्र ने कहा - जैन धर्म ने मूल कथा को नया मोड़ दिया। जैन साहित्य वैदिक धर्म के बराबर पुराना है। इसमें जीव विचार , आत्मा का अस्तित्व, ज्ञान के सभी विषय पर वर्णन मिलता है। तरुण विजय की रामायण अद्वितीय ग्रंथ रत्न है। राज्य का, कुटुंब का पालन कैसे होता है, जीवन को कैसे जिया जाता है, आदि का वर्णन इसमें मिलता है। जीवन की आचार संहिता के रूप में हम इन्हें प्राप्त करते हैं।
वक्ता - डॉ. नजमा मलेक, नवसारी, गुजरात ने कहा - जैन धर्म की रोचक परंपरा है। 1500 वर्ष तक निरंतर रामकथा की रचना की है। जन्म, विवाह, वन गमन, सीता हरण, तलाश, युद्ध और अंत में उत्तर चरित्र है। इन्होंने जैन धर्म के कवि एवं उनकी रचनाएं- पौन चरिय, उत्तर पुराण, जैन रामायण आदि रचनाओं के समय को वक्तव्य में बताया।
कार्यक्रम का श्रेष्ठ संचालन डॉ. रश्मि चौबे, गाजियाबाद प्रतिनिधि एवं राष्ट्रीय बाल संसद प्रभारी, गाजियाबाद उ. प्र. ने किया।
कार्यक्रम की शुरुआत श्रीमती रश्मि लहर, प्रतिनिधि लखनऊ , द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुई। स्वागत भाषण श्री लक्ष्मीकांत वैष्णव, युवा संसद प्रभारी, जांजगीर, चंपा छत्तीसगढ़ की स्वरचित रचना से हुआ। आभार प्रदर्शन सभी के व्यक्तित्व की विशेषताएं बताते हुए डॉ. गोकुलेश्वर द्विवेदी, संस्था सचिव, प्रयागराज द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में पूर्णिमा झंडे, पवीर सिंह, अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, डॉ. भारत शेणकर आदि अन्य अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।