|| गहन चिंतन || अंदर से अस्तित्व को पहचानने की एकान्तिक व्याकुलता!
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ज्यादातर जिन्दगी ऐसे जीने में निकल जाती है जो हम नहीं हैं। बहुत थोड़ी सी जिन्दगी बिना बनावट के या बिना स्वांग के निकल पाती है। सबकी बात नहीं कह सकते, पर हममें से काफी ऐसे होंगे जो जीना तो किसी और तरीके से चाहते हैं लेकिन जीते किसी और अलग ही तरीके से हैं। अपनी चाहत के हिसाब से जीना बेहद जोखिम का काम है।
एक आदमी दुनिया घूमकर देखना चाहता है। लेकिन रोजी कमाने में ही उसकी पूरी जिन्दगी किसी एक जगह पर यों ही निकल जाती है। कभी कभी लगता है कि आजादी सिर्फ एक खयाल है, असल में आजादी जैसी कोई चीज होती ही नहीं। सब एक खांचे में बंधा हुआ है। यहां तक कि शायद खयाल की आजादी भी खयाल ही है, असल में वहां भी बंधे बंधे ही सब सोचना है। जन्मगत या पालन-पोषण या फिर पढ़ाई-लिखाई से उपजे संस्कारों के बंधन की सीमा में हमारी जीवन भर की सोच बंधे बंधे खत्म हो जाती है। कुछ अलग हम शायद ही सोच पाते हैं। ऐसा लगता है। सच क्या है, पता नहीं!
अंदर से अस्तित्व को पहचानने की एकान्तिक व्याकुलता जब तक हृदय को मथने न लगे, तब तक आध्यात्मिक यात्रा का आरम्भ नहीं होता। हृदय की यह व्याकुलता फिर हृदय को द्वेष से विरत करने लगती है। फिर किसी के प्रति द्वेषात्मक अपशब्द का उद्वेग हृदय में नहीं उठता। राग फिर भी रह जाता है। यात्रा में इसी राग की दिशा को मोड़कर इसे इष्ट के प्रति प्रेम रस से सिक्त करना होता है। अभी तो इतना ही समझ में आता है।
- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)