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जी करता है...


तेरी गिरेबां में 
गिरफ्त होने को
जी करता है,
इन नैनों में 
लीन हो जाऊं, जी करता है,
होशो - हवास का कहना ही क्या,
तेरी ज़ुल्फें संवारने को जी करता है।।

इन चरागों से रोशनी की क्या जरूरत, 
तेरा दमकता चेहरा ही काफी है, 
हुस्न और इश्क़ के दरमियान
तेरी पलकें झुकाना ही काफी है।

मेरे धीरज की दाद तो दो, 
मेरे हमसफर जो सामने हैं,
जी सम्हाले बैठे हैं हम इधर, 
उन्हें आगोश में ले लूं, जी करता है।।

- डॉ. शिवनारायण आचार्य 'शिव'
नागपुर (महाराष्ट्र)
काव्य 1977796220741322202
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