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डीजे को दौर में भी घर घर गूंजती हैं कोकिलकंठी सिंधी गायिका भगवंती नावाणी की आवाज़


1 फरवरी को जन्म दिवस पर विशेष

सिंधी समाज की लता मंगेशकर नाम से प्रसिद्व गायिका भगवंती नावाणी घर घर का जाना पहचाना नाम है। भगवंती नावाणी ने उस दौर में अपनी गायन प्रतिभा से सबको चकित कर दिया जब विभाजन के पश्चात् बिखरे हुए सिंधी समाज का दुःख दर्द बांटने वाला कोई नहीं था। न सिर्फ भारत देश में अपितु विदेशों में भी जहां सिंधी समाज प्रचुर मात्रा में है वहां जाकर स्टेज शोज़ किये। जब वे स्टेज पर आकर गीत शुरू करने से पहले मुस्करातीं थीं तो उसकी मुस्कराहट से सिंधी समाज बंटवारे के ज़ख्मों पर मरहम जैसा महसूस करता था। यही कारण है कि भगवंती नावाणी को मुस्कराहटों की महारानी कहा जाता है। 

1 फरवरी 1940 के दिन सिंध के नसरपुर शहर के नावाणी परिवार में भगवंती का जन्म हुआ, ज़िन्दगी के हर रंग को अपनी आवाज़ के ज़रिये उभारने वाली इस कोकिल कंठी गायिका की संगीत से पहली पहचान अपने ही घर में हुई। जब वह छोटी ही थी तब उसकी दादी भजन और लोकगीत गाया करती थी। संगीत की आकर्षण-शक्ति ने बालिका भगवंती को भी अपनी ओर आकर्षित किया और वह भी अपनी दादी के साथ मिलकर गाने लगी। भगवंती ने संगीत की विधिवत शिक्षा पहले देवधर म्यूज़िक स्कूल और निखिल घोष के अरूण संगीत विद्यालय में प्राप्त की। 

तत्पश्चरत् व्यवहारिक शिक्षा इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन ‘इप्टा’ में कनु घोष और कनु राव के मार्गदर्शन में प्राप्त की। बंगाली संगीतकारो के अधिक संसर्ग में रहने के कारण भगवंती का ध्यान ‘रवीन्द्र संगीत’ की तरफ भी गया, फलस्वरूप उसने चित्रा बरूआ और हेमंत कुमार के मार्गदर्शन में रवीन्द्र संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की। सिंध से पलायन करने के पश्चात् उनका परिवार मुंबई आ बसा। भगवंती आसानंद मामतोरा स्कूल में पढ़ने लगी। गोविंद माल्ही वहां शिक्षक थे। वे प्रसिद्ध नाटककार एवं निर्देशक भी थे तथा इप्टा से जुड़े हुए थे। भगवंती के बड़े भाई ईश्वर नावाणी भी उनके साथ इप्टा के नाटकों में काम करते थे। 

भगवंती स्कूल के कार्यक्रमों में अक्सर गीत गाती थीं। वहीं गोविंद माल्ही ने उन्हें तराशा और अपने नाटकों में काम दिया। इस तरह कला के क्षेत्र में उनकी शुरूआत सिंधी नाटकों से हुई। गोबिन्द माल्ही’ के निर्देशन में कलाकार मंडल नामक नाट्य मंडली में 'गुस्ताख़ी माफ', 'मेहमान', 'तुहिंजो सो मुहिंजो', 'देश जी ललकार' और 'इन में को शकु अथव' आदि नाटकों में तो काम किया ही, गोबिन्द माल्ही’ के ही निर्देशन में बनी सिंधी फिल्म 'सिंधूअ जे किनारे' में नायिका की भूमिका भी बखूबी निभाई और अपनी मधुर आवाज़ में गीत भी गाए। आगे चलकर गोविंद माल्ही ने कलाकार मंडल नामक संस्था में संगीत के प्रोग्राम भी आरंभ किये तो भगवंती को उसमें गायिका के रूप में चांस दिया जिसमें वह सफल हुई और गायन की ओर रूख किया। 

25 वर्षों के गायकी के कैरियर में उसने करीब 3000 सिंधी गीत गाए। विभाजन के समय सिंध छूटने के बाद सिंधी-हिन्दू भारत के कोने कोने में फैल गये। नये परिवेश से सामंजस्य स्थापित करने के लिये उन्होंने निःसंकोच स्थानीय भाषाओं को अपना लिया। इस दौरान उनका ध्यान अपनी मातृभाषा सिंधी से हट गया। अधिकांश सिंधी भाषियों को अपने बच्चों को स्थानीय भाषा अथवा अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा दिलवाने के लिये बाध्य होना पड़ा। इस तरह नई पीढ़ी के सिंधी भाषा, संस्कृति व साहित्य से दिनों-दिन दूर होते जाने का ख़तरा पैदा हो गया। 

भगवंती ने श्री गोबिन्द माल्ही के साथ मिलकर इस सांस्कृतिक संकट से निपटने के लिये अथक प्रयत्न किये तथा अपने गीत-संगीत के माध्यम से न केवल भारत के कोने कोने में बिखरे सिंधी भाषियों में अपनी भाषा व संस्कृति के प्रति एक नई चेतना का संचार करने में सफल रहे बल्कि दुनिया के अन्य मुल्कों में जा बसे सिंधियों के बीच पहुंचकर भी वही काम अंजाम दिया। 

22 अक्टूबर, 1986 के दिन अल्प बीमारी के बाद कुमारी भगवंती नावाणी का मुम्बई के एक अस्पताल में अल्प बीमारी के बाद निधन हो गया। फकत 46 वर्षों की हसीन ज़िंदगी जीने के बाद वो इस दुनियां को अलविदा कर गई। लगभग सभी सिंधी फिल्मों में मुख्य गायिका रही इस कलाकारा ने बिमल राय की हिन्दी फिल्म ’बिराज बहू’ में तुलसी की चैपाईयों को भी को अपनी आवाज़ दी। 

इस कलाकारा की आवाज़ ग्रामोफोन कम्पनी आफ इंडिया तथा हिज़ मास्टर्स वाइस के रिकार्डस पर होने के अलावा कई आडियो कैसेट्स पर भी मौजूद है जिनमें उसने अपने कलाकार मंडल के साथी सतराम रोहिड़ा (जिसने आगे चलकर हिन्दी फिल्म ’जय संतोषी मां’ का निर्माण किया) तथा प्रसिध्द फिल्मी गायक ’महेन्द्र कपूर’ के साथ गीत गाये हैं। 

वैसे तो इनकी आवाज़ में भरे गये लगभग सभी रिकार्डस और कैसेटस सिंधी-जगत में लोकप्रिय हैं, लेकिन विशेषकर गुरूवाणी की कैसेट ‘सुखमनी’ अधिकांश सिंधियों के घरों में आज भी रोज़ सुबह सुनी जाती है। आज के इंटरनेट और डी.जे. के ज़माने में भी भगवन्ती की आवाज़ घर घर गूंजती है। वे एक प्रसिद्व लोक गायिका थीं। उन्होंने अपना सारा जीवन संगीत को समर्पित कर दिया। उनकी आवाज़ में इतनी मिठास थी कि लोग उसे सिंधी कोयल के नाम से संबोधित करते था। भगवंती ने सिंधी समाज का लोक गीत लाडा बहुत गाया जो कि शादी ब्याह के अवसर पर गाया जाता है जिससे वो घर घर की आवाज़ बन गई। 

सिंध की त्रिमूर्ति शाह सचल सामी के गीतों के अलावा किशनचंद बेवस, हूंदराज दुखायल, प्रभू वफा, शेख अयाज़, अर्जुद हासिद, अर्जुन शाद, मोती प्रकाश, गोवर्धन भारती, वासदेव निर्मल वगैरह अनेक शायरों के गीत गाए। सिंधी समाज की अनेक संस्थाओं से उन्हें कई पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। उसने अपने आवाज़ के जादू से  देश विदेश में अपना नाम रोशन किया। आज भले डीजे को दौर चल रहा है फिर भी सिंधी समाज के घरों में खुशी के हर मौके पर  भगवंती नावाणी के गीत बजाए जाते हैं जिन्हें सुनकर अनायास ही सबके पांव थिरकने लगते हैं। 

प्रसिद्व सिंधी उपन्यासकार गोविंद माल्ही भगवंती के गुरू थे। भगवंती ने झूलेलाल, लाडली, सिंधूअ जे किनारे,शल धियर न जमनि, हो जमालो, कंवरराम, हलु त भजी हलूं, परदेसी प्रीतम जैसी सिंधी फिल्मों के गीत गाए। भगवंती का आवाज़ सुखमनी ज़रिए घर घर की पहचान बन गया। 

- किशोर लालवाणी
सदस्य,सिंधी भाषा सलाहकार समिति, केेद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
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