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खाये अघाये लोग !



खाये अघाये लोग अक्सर धर्म के बाहरी खोल में रुचि लेने लगते हैं। उन्हें आर्थिक असुरक्षा का कोई डर नहीं रहता और करने को कोई खास काम नहीं। हिन्दू हैं तो किसी क्रियाकाण्डी पाखण्ड में रचे बसे पुरोहित के तिलक और दाढ़ी में मन का अटकाव - भटकाव तलाशते फिरते हैं। अगर मुस्लिम हैं तो किसी कठमुल्ले की इस्लामी दाढ़ी, खास टोपी और विशिष्ट पैजामा पोशाक की दिमागी चकरघिन्नी में नाचते नजर आते हैं। दोनों ही अपने में विशिष्टता और दूसरों में अपशिष्टता के दर्शन करते हैं। दोनों ही गपोड़ी हो जाते हैं यानि कि अपने धर्म के बारे में सतही ज्ञान को झूठ की गाढ़ी चाशनी में लपेट कर जो मिल जाये उसी को चटाने की ताक में रहते हैं। 

इनके अलावा इन्हीं खाये अघाये लोगों की एक तीसरी प्रजाति है जो खुद को नास्तिक कहती है लेकिन इस प्रजाति के लोग गरीबों को तलाश तलाश कर उनके फोटो वीडियो आदि बनाते हैं और उनके उत्थान के काम करने के गगनचुंबी दावे करते हैं। इनमें से ज्यादातर जमीन पर खुद ऐसा कुछ भी नहीं करते सिवा अपने लेखों, किताबों आदि से प्रचार माध्यमों में छाये रहने के। आजकल ये तीनों तरह के परजीवी फेसबुक पर बहुतायत से पाये जाते हैं। 

इन सब के सिरमौर जहाँ तहाँ झूठ की लजीज चाशनी के साथ हर तरह का जहर परोसते हुये, लगभग अपने सभी चाहने वालों (या न चाहने वालों को भी), धीरे-धीरे नीम-बेहोशी की हालत में ले जा रहे हैं, और बेहोशों को पता भी नहीं चल रहा है। कोई माने या न माने, ये सब कुछ खाये और हद से ज्यादा अघाये लोग ही समाज का सबसे ज्यादा बुरा करने वाले लोग हैं। और हमारे बेहद करीब रहने वालों में से हैं। इसलिये इनसे हम सतर्क भी नहीं रह सकते।

- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)
लेख 1355378360368590508
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