'हिंदी के प्रचार प्रसार में महिलाओं का योगदान' पर सफल रही परिचर्चा
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नागपुर। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित परिचर्चा में महिला दिवस के वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विषय को संपादित किया गया। 'हिंदी के प्रचार प्रसार में महिलाओं का योगदान' इस विषय पर सुधी वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
मंच पर महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य डाॅ. सागर खादीवाला, राष्ट्रपत्रिका के संपादक श्रीकृष्ण नागपाल, किशन शर्मा, एवं आकाशवाणी उद्घोषिका तथा रंगकर्मी श्रद्धा भारद्वाज विराजमान थीं। विदुषी सुधा राठौर ने सरस सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का आरंभ किया।
संयोजक अविनाश बागड़े की प्रस्तावना के बाद महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के सचिव - सचिन निंबालकर ने अकादमी के उद्देश्य और कार्य प्रणाली पर प्रकाश डालते हुए अपनी शुभकामनाएं दीं। किशन शर्मा ने अकादमी के भूत, भविष्य, और वर्तमान से जुड़े हुए अनेक सारगर्भित प्रसंग श्रोताओं के सम्मुख रखे।
विशेष अतिथि की आसंदी से बोलते हुए श्रीकृष्ण नागपाल ने हिंदी के प्रचार प्रसार में महिलाओं की भूमिका को सर्वोपरि निरूपित किया।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. सागर खादीवाला - ने कहा कि अगर किसी राष्ट्र की संस्कृति नष्ट करना है तो उसकी भाषा - लिपि नष्ट कर दो। वर्तमान तकनीकी दौर में यही प्रयास हो रहा है। हिंदी को रोमन में लिखा जा रहा है। यह घातक है। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की पूर्व सदस्य डॉ. मधु लता व्यास ने मराठी कृतियों के हिंदी अनुवाद की जरूरत महसूस की ताकि संवाद के जरिए हिंदी के प्रचार प्रसार की संभावनाएं मुखर हों।
सभा में उपस्थित सिंधी अकादमी के सदस्य किशोर लालवानी ने स्पष्ट किया कि हिन्दी लेखिकाओं ने यथासंभव अभिव्यक्ति के खतरे उठाने हैं। लेखिका प्रभा मेहता ने अपने भावुक वक्तव्य में कहा कि- मुझे मेरी मातृभाषा अच्छी लगती है क्योंकि मुझे मेरी मां अच्छी लगती है। उनके अनुसार हिंदी के प्रचार प्रसार में समस्त हिन्दी भाषी महिला साहित्यकारों का अमूल्य योगदान है वह हिंदी साहित्य की धरोहर है, किंतु देश की उन समस्त अहिंदी भाषी महिलाओं का विशेष उल लेख अनिवार्य है जिन्होंने हिंदी के प्रचार प्रसार में पूरा जीवन अर्पण किया। जैसे नागालैंड की वह महिला जिसने दूध पीती बच्ची को पीठ पर लादकर वर्धा जाकर राष्ट्रभाषा प्रचार समीति में हिंदी का अध्ययन किया, वापस नागालैंड आकर घर घर जा हिंदी का प्रचार, प्रसार किया। नागालैंड में राष्ट्रभाषा हिंदी शिक्षण संस्थान की स्थापना की व उस स्थान को हिंदी नगर नाम दिया। इनके जैसी अनेक अहिंदी भाषी हिंदी के प्रचार प्रसार में संलग्न महिलाएं वंदनीय हैं ।
बंगला की प्रख्यात नाट्य कर्मी श्रीमती रूबी दास ने अपने वक्तव्य में बताया कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है इस भाषा के प्रचार प्रसार और परिपुष्ट करने के लिये नारियों का योगदान रहा है। महिला साहित्यकारा भक्तिकाल से आधुनिक काल तक सृजन करती आई है। भक्तिकाल मे मीरा ने कृष्ण के भक्ति से विमुग्ध कर दिया। भक्तिकाल मे और भी साहित्यकारा जैसे रायप्रवीन, तेज प्रताप, कुंवर बाई,सुन्दर बाई, चन्द्रकला बाई, दया बाई, जुगुल प्रिया, जना बाई, पानबाई आदि ने हिन्दी के विकास में हाथ बटांया। भक्ति और श्रृंगार रस को पल्लवित किया।रीतिकाल भी महिला साहित्यकारा से अछूता नही रहा। पुरूषों से कदम मिलाकर हिन्दी के विकास धारा को बुलंद किया।
आधुनिक युग में खड़ी बोली का विकास हुआ छायावाद काल मे महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, जैसे कवयित्री ने हास्य व्यंग, देशभक्ति, श्रृगांर मे रचना कर हिन्दी को परिपक्व किया। हिन्दी साहित्य की उज्वल नक्षत्र महादेवी वर्मा को कौन नही जानता। इसी तरह सुभद्रा कुमारी सिंह, विद्या पति कोकिल, विद्यापति चित्र, शकुन्तला, रजनी पणिक्कर, इनके अवदान से आज भी हिन्दी साहित्य की पवन धारा बह रही हैं।
भोग विलास से लिप्त राजाओं के नखशिखा से वर्णन सुन्दरी कुंवर ने हिन्दी मे लिखकर किया है।आजादी के लड़ाई के दौरान उषा देवी मिश्रा, सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा समकालीन विषयों को लेकर अभिव्यक्त किया है। पारम्परिक छवि को तोड़कर नये रूप में मीनू भंडारी, प्रियंवदा, चन्द्र किरण, अमॄता प्रीतम, शिवानी, कृष्णा सोती, मेहरुन्निसा परवेज़ हिन्दी मे लिखकर योगदान कर रही है। नारी मुक्ति का वर्णन लेखिकाओं ने हिन्दी मे लिखकर ज्यादा मुखर रूप में अभिव्यक्ति हुआ है। हिन्दी पत्रकारिता मे भी महिलाएं बढ़ चढ़ कर योगदान कर रही है।अनुराधा सिंह मोनिका कुमार का नाम ऊभर कर आ रहा है। सभी क्षेत्र व वैश्विक स्तर पर हिन्दी के प्रचार प्रसार मे आदिकाल से महिलाओं का योगदान चला आ रहा है।
साहित्यकार इंदिरा किसलय ने कहा - भारत के हर चौथे व्यक्ति की मातृभाषा हिंदी है। मां हिंदी के संस्कार रोपती है। 'कोई भी भाषा सत्ता के संरक्षण के बिना फल फूल नहीं सकती' महिलाएं जितनी अधिक संख्या में राजनीति में अपनी भागीदारी दर्ज करेंगी हिंदी के प्रसार की संभावनाएं उतनी ही प्रबल होंगी।
म .रा. हि. सा.अकादमी के पूर्व सदस्य, प्रकाशक, तथा सक्षम कवि अविनाश बागड़े के रोचक मंच संचालन ने श्रोताओं को बांधे रखा। व्यंग्य शिल्पी अनिल मालोकर ने आभार माना। कार्यक्रम में न केवल मंचासीन मान्यवरों का वरन समस्त उपस्थितों का किताबें देकर सम्मान किया गया, इस विश्वास के साथ कि भविष्य में यही प्रथा जारी रखी जाएगी। पुष्पगुच्छ, श्रीफल एवं अंगवस्त्र के स्थान पर पुस्तक देने से पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।