दान करना है तो मानवता के मंदिर में कीजिए : नरेंद्र सतीजा
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नागपुर। कहते हैं दान सुपात्र को ही देना चाहिए अर्थात सहायता जरूरतमंद की ही करनी चाहिए. हमारी मान्यता रही है कि मंदिरों में दान करने से पुण्य मिलता है और शायद इसीलिए मंदिरों में दान की बारिश निरंतर जारी रहती है. यही कारण है कि देश के बड़े मंदिरों में टनों से सोना चांदी के अलावा करोड़ों रुपये नगदी अथवा बैंकों में जमा पड़े हुए हैं. पड़े हुए इसीलिए क्योंकि जमा राशि में केवल इजाफा ही हो रहा है और पर्याप्त रूप से खर्च नहीं की जाती है. फिर मंदिर दान के सुपात्र कैसे हुए?
हमारा विश्वास है कि दान जरूर कीजिए लेकिन मानवता के मंदिर में. निश्चित रूप से मंदिरों के साथ हमारी आस्था जुड़ी हुई है और हम दिल खोल कर दान देते हैं. इस बात पर विवाद नहीं होना चाहिए कि मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है और हम दान वहीं दें जहां मानव सेवा को समर्पित काम किये जा रहे हैं. देखिये कैसी विडंबना है भिखारी मंदिर के अंदर भी हैं और बाहर भी. पैसे वाले मंदिर में जाकर हाथ फैलाते हैं और गरीब मंदिर के बाहर. फर्क हमारी सोच का है क्योंकि हम परमात्मा को पहचान नहीं पाये.
हम केवल दिखावे की जिंदगी जीते हैं और यथार्थ से दूर रहते हैं. सच्चाई तो यह है कि परमात्मा का वास हमारे दिल में है. दुखी व्यक्ति की सेवा ही ईश्वर सेवा है. आजकल नये-नये मंदिरों की स्थापना का दौर चल पड़ा है और आधुनिक रूप देने के लिए बेहिसाब खर्च किया जा रहा है. सोने का मुकुट, सोने का सिंहासन और भी बहुत कुछ. दिखावे की दुनिया में आस्था लुप्त होती जा रही है. इन दिनों बाबाओं के आधुनिकतम आश्रमों का निर्माण हो रहा है. यहां भी पैसा तथाकथित दान से ही मिलता है.
गरीबों के लिये मकान के अलावा चिकित्सा केंद्र व शैक्षणिक संस्थानों की सख्त जरूरत है लेकिन इसे सरकारी काम बताकर हम पल्ला झाड़ रहे हैं. नर सेवा नारायण सेवा अथवा मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है जैसी बातें किताबों में कैद होकर रह गयी हैं. जिस दिन हम यह सम़झ लेंगे कि हर व्यक्ति में भगवान है तो जीना सचमुच आसान हो जायेगा. गमों की आंच पे आंसू उबालकर देखो,
बनेंगे रंग कई किसी पे डालकर देखो,
तुम्हारे दिल की चुभन भी कम होगी,
किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो.
