परीक्षा..
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‘परीक्षा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - ‘परि’ और ‘ईक्षा/इक्षा’। परि का अर्थ है चारों ओर से या पूर्ण रूप से तथा ईक्षा (इक्षा) का अर्थ है देखना या जाँचना। इस प्रकार परीक्षा का शाब्दिक अर्थ हुआ— किसी व्यक्ति या विषय को चारों ओर से देखकर जाँचना या परखना।
परीक्षा का अर्थ - ‘परीक्षा’ शब्द का अर्थ है किसी व्यक्ति के ज्ञान, क्षमता, कौशल और समझ का मूल्यांकन करना। जैसे परीक्षा के माध्यम से यह जाना जाता है कि विद्यार्थी ने कितना सही सीखा है। यह केवल अंकों का माध्यम नहीं होती, बल्कि आत्म-मूल्यांकन का भी अवसर देती है। परीक्षा हमें अनुशासन, समय प्रबंधन और निरंतर परिश्रम की सीख देती है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें सुधारने का अवसर मिलता है। इसलिए परीक्षा जीवन में प्रगति का एक महत्वपूर्ण साधन है, जो हमें बेहतर बनने की दिशा दिखाती है।
परीक्षा का महत्व - परीक्षा का जीवन में बहुत अधिक महत्व है परीक्षा जीवन का एक महत्वपूर्ण अनुभव है जब भी परीक्षा का नाम आता है तो मन में थोड़ा भय होता है ।पर साथ ही अपनी मेहनत को परखने का अवसर भी मिलता है। जैसे परीक्षा एक छात्र को यह बताती है कि उसने पूरे वर्ष क्या सीखा और कितना समझ पाया ।यह केवल प्रश्नों के उत्तर लिखने की प्रक्रिया नहीं बल्कि धैर्य, आत्मविश्वास और समय प्रबंधन की परीक्षा भी होती है। परीक्षा के द्वारा ही विद्यार्थी अपने ज्ञान, समझ और मेहनत का मूल्यांकन करते हैं। यह हमें अनुशासन और नियमित अध्ययन की आदत सिखाती है। परीक्षा से ही आत्मविश्वास बढ़ता है,जीवन में आगे बढ़ाने के लिए परीक्षा हमें चुनौतियों का सामना करना सिखाती है।इस प्रकार परीक्षा हमारे सर्वांगीण विकास में सहायक होती है।
परीक्षा को केवल अंकों के आधार पर न आंके- परीक्षा में किसी विद्यार्थी को केवल अंकों के आधार पर नहीं आँकना चाहिए। अंक यह बताते हैं कि विद्यार्थी ने प्रश्न-पत्र में कैसा प्रदर्शन किया, लेकिन वे उसकी पूरी क्षमता, मेहनत, रचनात्मकता और व्यवहार को नहीं दर्शाते। कई विद्यार्थी समझदार और प्रतिभाशाली होते हैं, परंतु परीक्षा के डर या अन्य कारणों से अच्छे अंक नहीं ला पाते। शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और अच्छे संस्कार विकसित करना है। इसलिए विद्यार्थी का मूल्यांकन उसकी समझ, प्रयास, व्यवहार और प्रतिभा के आधार पर भी किया जाना चाहिए, न कि केवल अंकों से।
परीक्षा की तैयारी -परीक्षा की तैयारी यदि सही ढंग से की जाए तो डर और तनाव से बचा जा सकता है। विद्यार्थी को सबसे पहले एक सरल और व्यवस्थित समय-सारिणी बनानी चाहिए और नियमित रूप से पढ़ाई करनी चाहिए। कठिन विषयों को छोटे भागों में बाँटकर समझना और रोज़ पुनरावृत्ति करना बहुत लाभदायक होता है। समय-समय पर अभ्यास प्रश्न और पुराने प्रश्न-पत्र हल करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। पढ़ाई के साथ-साथ पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और थोड़े विश्राम का ध्यान रखना चाहिए। सकारात्मक सोच, स्वयं पर विश्वास और माता-पिता व शिक्षकों का मार्गदर्शन अपनाकर विद्यार्थी बिना डर के परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
परीक्षा में माता-पिता की भूमिका - परीक्षा की तैयारी में माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे बच्चों को प्रेम, सहयोग और प्रोत्साहन देकर मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं। माता-पिता को बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने के बजाय उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए और सकारात्मक वातावरण प्रदान करना चाहिए। समय पर पढ़ाई की आदत, अनुशासन और आत्मविश्वास विकसित करने में माता-पिता का मार्गदर्शन बहुत सहायक होता है। परीक्षा के समय उनका धैर्य, समझ और समर्थन बच्चों को सफलता की ओर प्रेरित करता है।
परीक्षा की तैयारी में विद्यालय ,शिक्षक और सहपाठियों का सहयोग - परीक्षा के समय विद्यालय, शिक्षक और सहपाठियों का सहयोग विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। विद्यालय अनुशासित वातावरण, उचित समय-सारिणी और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर परीक्षा की तैयारी को सुगम बनाता है। शिक्षक अपने मार्गदर्शन, अभ्यास कार्य, समझाने की विधि और प्रेरणा से विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। सहपाठी आपसी सहयोग, चर्चा और समूह अध्ययन के माध्यम से कठिन विषयों को सरल बनाते हैं। इस प्रकार सभी के सहयोग से विद्यार्थी तनावमुक्त होकर बेहतर प्रदर्शन कर पाता है और सफलता की ओर अग्रसर होता है।
इस प्रकार माता-पिता, विद्यालय,शिक्षक और सहपाठियों के सहयोग से एवं प्रोत्साहन से परीक्षा को आसान बना सकते हैं। हर वक्त विद्यार्थियों का मनोबल बढ़ाएं उन्हें सकारात्मक सोचने के लिए प्रोत्साहित करें। परीक्षा का जो भय है उसे इसप्रकार पूरी तरह से दूर किया जा सकता है।
- रंजना इंद्रपालसिंह ठाकुर
28, समाधान नगर, नागपुर
8208181417
