Loading...

सामाजिक समन्वय का आधार है एकात्म मानव दर्शन : प्रो. बृजेन्द्र पाण्डेय


एकात्म मानव दर्शन और भारतीय समाज पर विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

नागपुर। एकात्म मानव दर्शन आधुनिक मानव समाज को देखने की एक समग्र दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह दर्शन बताता है कि व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा भिन्न नहीं हैं, वरन एक ही हैं। सृष्टि में विद्यमान प्रत्येक तत्व एक दूसरे के परस्पर पूरक हैं। वास्तव में, एकात्म मानव दर्शन सामाजिक समन्वय का आधार है। यह बात भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के अध्येता प्रो. बृजेन्द्र पाण्डेय ने कही। वे महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी तथा राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और दर्शनशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में *एकात्म मानव दर्शन और भारतीय समाज* विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उदघाटन सत्र में बोल रहे थे।


प्रो. पाण्डेय ने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की एक चिति होती है, उसका अपना एक दर्शन होता है, एक लक्ष्य होता है। वही राष्ट्र की अस्मिता का प्रेरक और प्रबोधक होता है।पं. दीनदयाल उपाध्याय बताते हैं कि भारत राष्ट्र की भी एक चिति है, जिसके सहारे यह राष्ट्र हजार वर्षों के आक्रमण के बाद भी जीवित है। यह चिति भारत की संस्कृति, सभ्यता और लोक जीवन में परिलक्षित होती है। 


अध्यक्षीय उद्बोधन में राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. मनाली क्षीरसागर ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारत के महान विचारक थे। उन्होंने अपनी वैचारिकी से भारतीय समाज को एकात्म मानव दर्शन जैसी महत्वपूर्ण दृष्टि दी। वे अंत्योदय की बात करते थे। उनका विचार सामाजिक समरसता का आधार है।

डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष, जयपुर ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में कहा कि एकात्म मानव दर्शन केवल विमर्श का विषय नहीं है, वरन् आचरण का विषय है। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने मानव समाज को एकीकृत होने का सूत्र दिया। प्रास्ताविक में कार्यक्रम के संयोजक हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति, समाज और भारतीयता को समझने की एक समग्र दृष्टि एकात्म मानव दर्शन से प्राप्त होती है। अंत्योदय की परिकल्पना भारतीय विचार और व्यवहार को एकीकृत दृष्टि से देखने पर बल देती है जिसमें सब की चिंता का भाव निहित है।

यशवंतराव चव्हाण राज्य मुक्त विद्यापीठ, नासिक के प्र-कुलगुरु प्रो. जोगेंद्र सिंह बिसेन ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय समाज व्यक्ति से लेकर सृष्टि के हर कण को ईश्वर का ही स्वरूप मानता है। इसलिए वह वृक्ष, नदी, पत्थर, पहाड़ आदि सबकी पूजा करता है, यह मानव के एकात्म भाव का परिचायक है। श्री सुनील किटकरू ने सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, स्व-बोध, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य में निहित एकात्म भाव पर प्रकाश डाला । केदार ठोसर ने कहा कि हमें अपनी परम्परा को युगानुकुल बना कर और बाहर से आए विचारों को देशानुकूल बनाना होगा। 

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के डॉ. प्रकाश त्रिपाठी ने मानव समाज के एकात्म जीवन मूल्यों की चर्चा की। अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. संजय पल्वेकर ने तृतीय सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में परस्पर सहयोग और सह अस्तित्व के भाव को महत्वपूर्ण बताया।  डॉ. मधुलता व्यास से अपने वक्तव्य में भारतीय संस्कृति के महत्त्व को रेखांकित किया। 

कार्यक्रम का संचालन डॉ. लखेश्वर चन्द्रवंशी ने किया तथा डॉ. संतोष गिरहे ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में नीरज श्रीवास्तव, नरेंद्र परिहार, राजेंद्र मालोकर, अविनाश बागड़े, टीकाराम साहू, डॉ.गोविंद प्रसाद उपाध्याय, डॉ. संदीप वर्मा, डॉ. एकादशी जैतवार, डॉ. सपना तिवारी, डॉ. नेहा कल्याणी सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शोधार्थी, विद्यार्थी एवं नगर के साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
समाचार 6667168054811326766
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list