होलिका दहन निर्णय :
https://www.zeromilepress.com/2026/03/blog-post_23.html
फाल्गुन शुक्ल पक्ष १४ सोमवार तारीख ०२.०३.२०२६ ई. प्रदोष वेला में साय ०३:३६ से ०९:०० तक होलिका का दहन करना श्रेष्ठ रहेगा।
संवत् २०८२ में फाल्गुन शुक्ल १४ के दिन (२ मार्च, २०२६) प्रदोषकाल में पूर्णिमा और संपूर्ण रात्रि में भद्रा की व्याप्ती है। दूसरे दिन पूर्णिमा सूर्यास्त से पूर्व समाप्त हो रही है किन्तु पूर्णिमा की व्याप्ती साढ़े तीन प्रहर से अधिक है और प्रतिपदा तिथि वृद्धिगामी है, इसलिये शास्त्रवचन के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा के दिन (३ मार्च, २०२६) को होना चाहिए था परंतु ३ मार्च के दिन ग्रस्तोदित चंद्र ग्रहण है और ग्रहणकाल तथा प्रदोष से पूर्व ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है।
ऐसी स्थिति में धर्मसिंधु के अनुसार होलिका दहन पूर्व दिन ही करना * इदं चंद्रग्रहणसत्वे वेधमध्ये कार्यम ग्रस्तोदये परदिने प्रदोषे पूर्णिमासत्वे ग्रहणमध्य एव कार्यम्। अन्यथा पूर्वदिने * - (धर्मसिंधु) दूसरे दिन में ग्रस्तोदय ग्रहण हो और प्रदोष काल में पूर्णिमा न हो तो पूर्व दिन ही होलिका दहन पूजा करें।
साढ़े तीन प्रहर से अधिक पूर्णिमा और प्रतिपदा वृद्धिगामी होते हुए भी धर्मसिंधु में दिये हुए - ग्रहण विचार के वचनानुसार होलिका दहन २ मार्च, २०२६ को प्रदोषकाल में करना शास्त्र सम्मत होगा। इस दिन भद्रा सायं ०५:५६ से मध्य रात्रि के बाद रात्रि शेष २६:२६ (३ तारीख की सुबह ०५:२६) तक रहेगी।
भद्रा के सम्बन्ध में शास्त्रों में लिखा गया है कि यदि भद्रा निशीथकाल (मध्य रात्रि) के बाद तक रहे तो फिर भद्रा में ही प्रदोष के समय भद्रा का मुख छोड़कर होलिका का दहन करें। इस वर्ष प्रदोष में भद्रा का मुख नहीं रहेगा इससे प्रदोष वेला (सूर्यास्त से २ घंटे २४ मिनट) में ही होलिका का दहन करना शास्त्रोक्त है।
- पंडित करण गोपाल पुरोहित (शर्मा)
पुराना कॉटन मार्केट, अमरावती.
9049451525, 8669165178
