युद्ध उन्माद
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इंसानियत जो भूल चुका,
वो पागल भूपति।
ओ रे हैवान ,
तूने नहीं देखी
माँ की नम आँखें।
बिलखते शिशु सब
भूखे तड़पते, दम तोड़ते
काश तू देखता।
मुझे नहीं चाहिए
ऐशों आराम ,बेशुमार धन,
आँसुओं के बदले।
कितना पत्थर दिल,
रोता भी नहीं
कराहते बच्चों को देख।
तुम ही वो,
शैतान ख़ूँख़ार पिशाच,
ख़ून हाथों पे।
- डॉ शिवनारायण आचार्य
नागपुर, महाराष्ट्र