'कृष्ण की पुण्याई'
https://www.zeromilepress.com/2026/04/blog-post_43.html
पुस्तक समीक्षा :--------------
लेखक : डॉ. कृष्णकुमार द्विवेदी
मूल्य : 175 रुपए
कुल पृष्ट संख्या : 72
समीक्षक : डॉ. मनोज फगवाड़वी
फगवाड़ा, पंजाब
श्रीकांत द्विवेदी और विद्या द्विवेदी के घर जन्में कृष्णकुमार द्विवेदी ने इस पुस्तक से पहले आस्था का दीप, संदेश सुनो गांधी और स्नेहल की प्रतिभा तीन पुस्तकें हिंदी साहित्य की झोली में डाली हैं। 'कृष्ण की पुण्याई' पुस्तक में कुल 23 लेख हैं। प्रसिद्ध लेखक नरेंद्र परिहार ने लिखा है लेखक ने दो वर्ष की श्रमसाध्य कोशिश और विषय की प्रासंगिकता पर भारतीय समाज के सनातन संस्कार और प्रचलित परम्पराओं का खुला दस्तावेज प्रस्तुत किया है।
प्रथम लेख में लेखक ने भगवान स्वरूप माता पिता की सेवा से बढ़कर और कोई दूसरी सेवा हो ही नहीं सकती। बजुर्ग और माता पिता की सेवा ही सर्वोपरि है।
द्वितीय लेख में उन्होंने लिखा है कि जो लेखक कम लिखते हैं और ज्यादा लिखने की डींगे मारते हैं यानी खुद की प्रशंसा कर रहे हैं वो असली लेखक नहीं है। बहुत ही सुन्दर लेख है। फ्लैटों में बंद चेहरे आज के हालात को मद्देनजर रख कर बहुत ही खूबसूरत लेख कृष्ण कुमार द्विवेदी ने लिखा है। एक अच्छे पड़ोसी के बारे में पठनीय लेख है। अपने इस लेख में उन्होंने आने वाले वर्ष के लिए लोगों को शुभ कामनाएं भी दी।
कृष्णकुमार द्विवेदी के कई लेख संस्कारपूर्ण हैं और कुछ तंज से भरपूर हैं। उनके लेख जहां एक ओर व्यंग्य से भरपूर दूसरी ओर समाज को सुधारने की ललक भी है। वातावरण पर भी अच्छा लेख है। एक साड़ी तो पसंद आई कटाक्ष पूर्ण लेख पठनीय एवं सराहनीय है। पढ़कर लुत्फ़ आता है। अगर शिक्षा बाजार बन जाए तो क्या करें तंज पूर्ण ज्ञान वर्धक और शिक्षाप्रद लेख है। इसी प्रकार कई लेखों में समाज में व्याप्त बुराईयों पर भी कृष्णकुमार द्विवेदी ने अपनी कलम चलाई है।
नागपुर महाराष्ट्र में निवास कर रहे लेखक ने अपने लेखों में विदेश की नकल के बारे मे खूब चर्चा की है। जो देशी लोगों की अक्ल पर बहुत भारी पड़ रही है। मंदिरों में दान की पुरानी परम्परा पर विद्वता पूर्ण लेख है। भक्ति की आड़ में पैसा कमाने का गोरखधंधा लेख में भगवान के भक्तों को अंधविश्वास से लूटने का विस्तृत वर्णन है। प्लास्टिक के फूल, खुशबू गए भूल लेख में असली फूलों से ज्यादा नकली फूलों की महत्त्ता के बारे मे महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। जनता को धरोहरों के प्रति उनके दायित्व का बोध कराया है।
विवाह संस्कारों के बाजारीकरण लेख विद्वता पूर्ण है। एक से बढ़कर एक रोचक लेख है जिन्हें पढ़ कर ही मज़ा एवं आनंद लिया जा सकता है। मेरा प्रिय पाठकों से अनुरोध है ऐसी किताब कभी कभी छपती है। इसका हमें पूरा लाभ होगा, ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से भी और भावपूर्ण संस्कारपूर्ण दृष्टि से भी। उम्मीद है लेखक इसी प्रकार खोज पूर्ण लेख लिख कर हिंदी साहित्य को प्रफुल्लित एवं स्वस्थ साहित्य देने की कृपा करेंगे।
