व्याकरण-सम्मत होकर ही बोली भाषा बनती है : डॉ. विनयकुमार पाठक
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नागपुर/रायपुर। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज छत्तीसगढ़ इकाई के द्वारा राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास में छत्तीसगढ़ी व्याकरण का योगदान रहा। संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. विजयालक्ष्मी रामटेके ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा में छत्तीसगढ़ी व्याकरण का महत्व महत्वपूर्ण होती है। 'कोई भी बोली व्याकरण बन जाने के बाद भाषा का स्वरूप ग्रहण करती है- ये विचार विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के आभासी संगोष्ठी में डॉ. विनय कुमार पाठक पूर्व अध्यक्ष (राज्मंत्रीदर्ज छत्तीसगढ़)राजभाषा आयोग एवं कुलपति विद्या पीठ गोपालगंज (बिहार) ने मुख्य वक्ता बतोरअपनी बात रखी। उन्होंने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ी ने बोली से विभाषा और फिर भाषा के क्षितिज को स्पर्श करती हुई राज्य सरकार की आकांक्षा के अनुरूप राजभाषा के पद में प्रतिष्ठित होने की और अग्रसर है। डॉ. पाठक ने हीरालाल काव्य उपाध्याय के प्रथम छत्तीसगढ़ी व्याकरण की महत्व निर्दिष्ट करते हुए आज के युग में छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण की उपाध्यता को प्रासंगिकता बताया तथा अनेक उदाहरणों से छत्तीसगढ़ी भाषा सामर्थ्य की चर्चा की।
व्याकरणविद् व कहानीकार डॉ. विनोद कुमार वर्मा* ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास में सबसे बड़ी बाधा छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य में अपभ्रंश लेखन था, जो अब क्रमशः कम होता जा रहा है। 22 जुलाई 2018 का दिन छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण के लिए 'टर्निंग पॉइंट' था। इसी दिन बिलासपुर में आयोजित राज्यस्तरीय संगोष्ठी में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि छत्तीसगढ़ी लेखन में हिंदी के लिए अंगीकृत देवनागरी लिपि के 52 वर्णों को स्वीकार किया जाए। इससे छत्तीसगढ़ी में अपभ्रंश लेखन की प्रथा समाप्त हुई। यह छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है। इसी वर्ष डाॅ विनय कुमार पाठक और डाॅ विनोद कुमार वर्मा ने 'छत्तीसगढ़ी काव्य सम्पूर्ण व्याकरण' ग्रंथ का लेखन किया जो एक मानक ग्रंथ के रूप में सभी विश्वविद्यालयों में समादृत है।
अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ.गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी सचिव विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज ने कहा कि छत्तीसगढ़ी कै भाषा के विकास में व्याकरण के योगदान में डॉ.पाठक और डॉ.वर्मा जी का विशेष योगदान रहा है। कार्यक्रम के आयोजन संयोजक को संचालन कर रही डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक छत्तीसगढ़ प्रभारी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी व्याकरण का ज्ञान और पाठ्यचर्या में व्याकरण की पुस्तक को स्कूल और महाविद्यालय में ज्यादा जैसे ज्यादा उपयोग किया जाना चाहिए ताकि छत्तीसगढ़ी भाषा विकास में सहायक सिद्ध हो। गोष्ठी का प्रारंभ लक्ष्मीकांत वैष्णव के सरस्वती वंदना से हुआ स्वागत डॉक्टर सरस्वती वर्मा सह प्रभारी के द्वारा किया गया। आभार डॉ. सुबिया फैसल के द्वारा किया गया। आभासी पटेल पर गोष्ठी में छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के अध्यक्ष कान्हा कौशिक, रायपुर, हरेराम बाजपेयी इन्दौर, डॉ.सोमा की.आर कर्नाटक, डॉ रश्मि चौबे गाजियाबाद, डॉ. सोनाली चौधरी नागपुर, सहित अनेक शिक्षाविद् एवं साहित्यकार उपस्थित रहे।
