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विदर्भ - मराठवाड़ा का किसान झेल रहा है दोहरी मार

आसमान ने मोड़ ली पीठ, व्यवस्था ने भी छोड़ दिया साथ

नागपुर (दिवाकर मोहोड)। कभी 'अन्नदाता' के रूप में सम्मानित किया जाने वाला किसान आज प्रकृति की बेरुखी और व्यवस्था की उदासीनता के कारण पूरी तरह असहाय हो गया है। विदर्भ और मराठवाड़ा में इस वर्ष मानसून समय पर नहीं पहुँचा। जून बीत गया और जुलाई का आधा महीना भी निकल गया, फिर भी संतोषजनक वर्षा नहीं हुई। शुरुआती हल्की बारिश पर भरोसा कर किसानों ने बुवाई तो कर दी, लेकिन उसके बाद बारिश ने साथ छोड़ दिया। परिणामस्वरूप खेतों में उगी कोमल फसलें सूखने लगी हैं। हरियाली के सपने अब चिंता और निराशा के साये में दबते जा रहे हैं।

बारिश के अभाव में फसलों की बढ़वार रुक गई है। कुएँ, तालाब, नदियाँ और नाले सूख चुके हैं। मोटर पंप चलाने की इच्छा होते हुए भी पानी की एक बूंद उपलब्ध नहीं है। ऐसे में किसान बेबस होकर आसमान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है। गाँव- गाँव में वर्षा के लिए पूजा, प्रार्थना और यज्ञ किए जा रहे हैं। विज्ञान के इस आधुनिक युग में भी खेती का आधार आज भी प्रकृति ही है- यह सच्चाई मन को पीड़ा देती है।

इस प्राकृतिक संकट के साथ-साथ कुछ कंपनियों द्वारा बेचे गए कथित नकली बीजों ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। अनेक किसानों के खेतों में बीज अंकुरित ही नहीं हुए, जिससे उन्हें दोबारा बुवाई करनी पड़ रही है। पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे किसान को फिर से बीज, खाद और मजदूरी पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। आर्थिक, मानसिक और सामाजिक दबाव दिन- ब- दिन असहनीय होता जा रहा है।

सरकारी तंत्र द्वारा नकली बीजों पर कार्रवाई किए जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन यदि कार्रवाई फसल का मौसम समाप्त होने के बाद हो, तो उससे किसान को क्या लाभ? दोषियों के विरुद्ध समय रहते कठोर कार्रवाई, बीजों की सख्त गुणवत्ता जांच और नुकसान की तत्काल भरपाई ही किसानों का विश्वास बनाए रख सकती है।

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि खेती अब भी पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। सिंचाई की ठोस व्यवस्था के अभाव में अनेक क्षेत्रों के किसानों को केवल एक ही फसल पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि जल संरक्षण, नहरों, खेत तालाबों, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया गया होता, तो आज हालात इतने भयावह नहीं होते।

किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। उसके आँसू, उसकी असफलता और उसकी पीड़ा पूरे समाज की पीड़ा होनी चाहिए। केवल घोषणाओं, आश्वासनों और पंचनामों से समस्या का समाधान नहीं होगा। तत्काल आर्थिक सहायता, नकली बीजों पर कठोर कार्रवाई, फसल बीमा दावों का शीघ्र भुगतान, सिंचाई परियोजनाओं को गति तथा टिकाऊ कृषि नीति का प्रभावी क्रियान्वयन- यही आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

बळीराजा (किसान) की आँखों में आज भी उम्मीद की एक किरण बाकी है। वह बारिश का इंतजार कर रहा है, लेकिन उतनी ही शिद्दत से उसे सरकार की संवेदनशीलता और समाज के सहयोग की भी आवश्यकता है। क्योंकि यदि किसान बचेगा, तभी खेती बचेगी; और जब खेती बचेगी, तभी देश समृद्ध होगा।

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