शिक्षा
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जिस के प्राप्ति से
आप के मन के
संदेह दूर हो
आप के मन के अंधेरे दूर हो
आप को लगे कि आप भी कुछ है।
पहले के जमाने में
जब हम स्वतंत्र थे
हमारे मन स्वतंत्र थे
जब हमारे ऊपर अंग्रेज या
मुगलों का प्रभाव नहीं था
हमारे बच्चे गुरुकुल में पढ़ने जाते थे
और लगभग बारह सालों के बाद
सुशिक्षित होकर लौट ते थे।
कभी कोई भ्रम नहीं रहता था
पढ़ने लिखने की भाषा एक रहती थी
पाठ्यक्रम एक रहता था
आश्रम में सारे बच्चे एक समान थे
कोई गरीब या अमीर नहीं रहते थे
सब एक समान खाते थे,
पर्णकुटी में रहते थे
एक ही पाठ पढ़ते थे
और बाद में अपने अपने जीवन में
लौट जाते थे।
प्रणाली इतनी पक्की थी
इतनी कार्यक्षम थी कि
हजारों साल चली।
बुद्ध, मुगल, तुर्की, और बाकी यूरोपियन
लोग इस में ज्यादा हानि नहीं पहुंचा सके
वो तो मैकाले की
कुटिल बुद्धि लगी जिस ने
कुछ दो सौ सालों पहले
इस प्रणाली की ताकत पहचानी
और गुरुकुलों को उद्ध्वस्त किये।
उस ने अपने राजा की सेवा करी
पर मानवता का बड़ा नुकसान किया।
बाद में हम स्वतंत्र हुए,
हमारा शासन आया
जो कि हमारा था ही नहीं
जिन्हों ने हमारे ऊपर राज किये
उन के मूल संदेह से भरे थे
उन के उद्देश्य दिशाहीन थे।
सब से ज्यादा हानि हमारी शिक्षा की हुई।
सस्ती लोकप्रियता के लिए
सस्ते निर्णय लिए गये और
आज ये परिस्थिति है कि
शिक्षा का ज्ञान से नाता ही टूट गया।
आज हमारा इतिहास अंधेरे में है,
हमारी भाषाएं अंधेरे में है,
हमारा संगीत अंधेरे में है,
हमारा नाट्यशास्त्र अंधेरे में है,
हमारी न्यायप्रणाली टूट चुकी है,
मूल्यांकन अंधेरे में है।
पढ़े लिखे बच्चे देश
छोड़कर निकल लेते
क्यों की उन्हें देश में
भविष्य नज़र नहीं आता
दुनिया के दूसरे देशों के लिए
भारत एक नर्सरी के
रूप में काम करता है
पके फल निर्यात हो रहे है
सडे गले बच जाते
ब्रेन ड्रेन सुनते सुनते
हमारी जिंदगी गुजर गई
सिर्फ वैदिक शिक्षा प्रणाली को
तकलीफ पहुंची है
क्रिश्चियन या इस्लामिक एजुकेशन
वैसे ही चल रहा जैसे पहले था।
इस के कारण हम सब को ढूंढना पड़ेंगे।
आज ही हमारे बच्चे
हम से दूर हो रहे है
हमारी संस्कृति से दूर हो रहे है
तो हमे ये लगता कि
वे लोग उन के उद्देश्य में सफल हुए।
दुनिया के बाकी देश में बच्चों को
उन के देश का इतिहास मालूम रहता
उन के खानपान स्वीकार रहते।
हमारे यहां ऐसा नहीं।
अभी इस में आरक्षण जुड़ा ही नहीं है
वो तो एक ऐसा अध्याय है
जिसे सिर्फ महसूस किया जाता है
धीरे धीरे ये बीमारी
अब पूरी तरह से फैल चुकी है
और अब ये
इररिवर्सिबल मोड तक पहुंच गई है
और बहुत जल्द
अपने मकाम को हासिल कर लेगी।
शिक्षा में सिर्फ
मेरिट चलना चाहिए
बाकी सुविधाएं देनी चाहिए
पर उधार का मेरिट नहीं
हम तो हमारी बाजी खेल चुके
सही गलत, टूटी फूटी ही सही
लेकिन भविष्य को देखकर
मन कांप उठता है
और किसी को कुछ पड़ी नहीं है
बस मेरा "आज का फायदा" इतना ही
मतलब है।
शिक्षा एलिमिनेशन की प्रक्रिया है
अच्छों में और अच्छे स्टूडेंट
ढूंढने की प्रक्रिया है
सौ लोगों में
वो एक खोजने की प्रक्रिया है,
भले ही वो कोई भी हो
लेकिन सही हो,
गलत नहीं।
- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
नागपुर, महाराष्ट्र
