शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता
नागपुर वैचारिक मंच की परिचर्चा में वक्ताओं की राय
नागपुर। नागपुर वैचारिक मंच की ओर से 'वर्तमान स्कूली शिक्षा व्यवस्था' विषय पर परिचर्चा का आयोजन सीताबर्डी स्थित हिंदी मोर भवन में किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार डॉ सुधीर सक्सेना ने की। वक्ताओं ने कहा कि सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य और समान होनी चाहिए। इसके लिए शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता है।
वरिष्ठ साहित्यकार इंदिरा किसलय ने कहा कि स्कूली शिक्षा व्यवस्था में इतनी खामियां हैं कि बच्चों को सड़क पर उतरना पड़ रहा है। 1 लाख सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए। स्कूलों की दुर्दशा के लिए सत्ता जिम्मेदार है। वरिष्ठ कवयित्री नीलम शुक्ला ने शिक्षा व्यवस्था की नींव को कमजोर बताते हुए कहा कि इसे मजबूत करने के लिए ध्यान देने की आवश्यकता है।
कवयित्री रुबी दास ने सवाल उठाया कि बच्चों को ट्यूशन की जरूरत क्यों है? शिक्षित शिक्षक नहीं है। हमारे शिक्षा पद्धति गलत है। पालकों को भी जागरूक होना होगा। वरिष्ठ गजलकार माधुरी राऊलकर ने कहा कि हमारे शिक्षा व्यवस्था उलझाऊ है पैसों के इर्द गिर्द घूम रही है। गांव में आज भी बच्चों को कई किमी दूर स्कूल जाना पड़ रहा है। शिक्षाविद रंजना श्रीवास्तव ने शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह खराब बताने को खारिज करते हुए कहा कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं।
बच्चों की शिक्षा के प्रति पालकों की भी जिम्मेदारी है। व्यंग्य कवि अनिल मालोकर ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में 70 से 80% खामियाँ है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। हिन्दी अधिकारी तेजवीर सिंह ने मातृभाषा में शिक्षा और ज्ञान परंपरा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सहभागी होकर ही सुधार किया जा सकता है। इसके लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
वरिष्ठ साहित्यकार एस पी सिंह ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि देश में सभी को समान शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो पाई। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन पर जोर दिया। वरिष्ठ कवि बलवंत भोयर ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में खामियों की बात शिक्षा मंत्री तक पहुंचाने की आवश्यकता है। शिक्षा में नैतिक मूल्यों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
हिन्दी अधिकारी पारसनाथ शर्मा ने कहा कि शिक्षा हर व्यक्ति की पहुंच में सर्वसुलभ हो। यह सरकार, पत्रकार और समाज तीनों की जिम्मेदारी है। शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। वन नेशन वन एजुकेशन लागू करने की जरूरत है। पाठ्यक्रम समान होना चाहिए। सभी को शिक्षा उपलब्ध नहीं करा पाना बहुत बड़ा अपराध है।
वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण नागपाल ने बच्चों की रुचि के अनुसार शिक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में कमियों की ओर सरकार का ध्यान दिलाना जरूरी है।
मंच के संयोजक व कवि डॉ राजेंद्र पटोरिया ने शिक्षा के राष्ट्रीयकरण पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास जरूरी है। विडंबना यह है कि शिक्षा बच्चों को नैतिकता और संस्कार नहीं दे पा रही है। वरिष्ठ पत्रकार एस एन विनोद ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था संविधान सम्मत होनी चाहिए। मंत्री, विधायकों के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं। शिक्षा में विषमता दूर होनी चाहिए। सभी को समान शिक्षा मिलनी चाहिए। अधिवक्ता ओ डी जैन ने कहा कि स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में अमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। शिक्षा ज्ञान अर्जन और धन उपार्जन का माध्यम होना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार डॉ सुधीर सक्सेना ने नागपुर वैचारिक मंच के उपक्रम की सराहना करते हुए इसे सार्थक प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि यह शर्मिंदगी की बात है कि अमृत काल में भी भारत को पूर्णतः साक्षर नहीं बना पाए। उन्होंने स्कूली शिक्षा को राष्ट्रीय के निर्माण की आधारशिला बताते हुए कहा कि बच्चों को मूल्य आधारित शिक्षा देने की आवश्यकता है। बच्चों में नागरिक बोध जगाया जाए। शिक्षा के व्यवसाय कारण के बजाय अनिवार्य और समान शिक्षा होनी चाहिए। संचालन डॉ. राजेंद्र पटोरिया ने किया। आभार टीकाराम साहू 'आजाद' ने माना।
रविवार, 18 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे आयोजित परिचर्चा का विषय 'लुप्त होती पठन संस्कृति' रखा गया है।
